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अमरीकी संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व राजकीय परंपराएँ

प्रश्न 1 : अमरीकी संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व राजकीय परंपराओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए

उत्तर : अमेरिका को ' राष्ट्रो का राष्ट्र ' कहा गया है । यूरोप की विभिन्न राष्ट्र - जातियों के करोड़ों लोग अमेरिका की आकृष्ट हुए और उसी को उन्होंने अपनी मातृ - भूमि मान लिया । प्रो . माइकेल केमन द्वारा प्रस्तुत आकड़ों के अनुसार १८२० अमेरिका की कुल जनसंख्या का ७७.५ प्रतिशत भाग उन लोगो का था जो उत्तर - पश्चिमी यूरोप से आए थे । उनके अलावा केंद्री यूरोप व पूर्वी यूरोप की भी बहुत सी जातियां अमेरिका में बस गई थी । एशिया , अफ्रीका और आस्ट्रेलिया के भी लाखों लो अमेरिका पहुँचे । इस प्रकार अमेरिका में विभिन्न राष्ट्रीय समुदायों , भाषाओं और धर्मो का समागम होता रहा है । वास्तव में जिसे अमेरिकी संस्कृति कहते हैं वह इन सभी जातियों के मिश्रण का परिणाम है । नीचे हम अमेरिका की राजनीतिक परंपरा का उल्ले करेंगे ।


औपनिवेशक शासन ( The Colonial Rule ) - अठारहवीं शताब्दी के मध्य में अटलांटिक महासागर के तट निकट अंग्रेजों के १३ उपनिवेश थे । ये सभी ब्रिटिश सरकार की अधीनता में थे । उपनिवेशों को तीन वर्गों में विभक्त किया जाता था


१. क्राउन प्रदेश ( Crown Colonies ) अर्थात ब्रिटिश सम्राट के अधीन वस्तियां । इन पर सम्राट ' गवर्नर ' के माध्य से शासन किया करता था । इन उपनिवेशों में न्यू हैम्पशायर , न्यूयार्क , न्यूजर्सी तथा जार्जिया शामिल थे ।


२. प्रोप्राइटरी प्रदेश ( Proprietary Colonies ) - इंग्लैंड के कुछ निजी व्यक्तियों के स्वामित्व वाली बस्तियां इ पेनेसलेवेनिया , डेलावेयर और मैरीलैंड प्रमुख थीं ।


३. चार्टर प्रदेश ( Charter Colonies ) - इन पर अमेरिका में रहने वाले कुछ विशिष्ट लोगों का अधिकार था । रोड द्वीप और कनक्टीकट इसी तरह के उपनिवेश थे । उपनिवेशों को आंतरिक मामलों में तो कुछ स्वतंत्रता प्राप्त थी , पर वैदेशिक मामलो में वे पूर्णतया ब्रिटिश सरकार के अधीन थे । उपनिवेशों के व्यापार पर भी ब्रिटिश सरकार का ही नियंत्रण था । उपनिवेशों की अपनी अलग - अलग विधानसभाएं जिनमें जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि बैठते थे । इन सभाओं का प्रायः अंग्रेज गवर्नरों व अन्य उच्च अधिकारियों से संघर्ष चलत रहता था । प्रो . टी . एच . रीड लिखते है , “ उपनिवेशों की जनता गवर्नरों को अपना शत्रू और विधानसभा को अपना मित्र समझ थी । दूसरे शब्दों में , विधानमंडल तो लोकप्रिय था पर कार्यपालिका बहुत बदनाम थी ।


" स्वतंत्रता की घोषणा ४ जुलाई १७७६ ( Declaration of Independence , 4th July , 1776 ) - उपनिवेशवासी राजनीतिक दृष्टि से जागरूक होते जा रहे थे । इसलिए उनके मन में स्वतंत्र राष्ट्र बनने की भावना जागी । दूसरी ओर फ्रांस के विरुद्ध लड़े गए सप्तवर्षीय युद्ध ( १७५६-१७६३ ) के कारण ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था बहुत जर्जर हो चुकी थी । ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने अमेरिका की जनता पर कुछ नए कर लगाने की योजना बनाई । १७६५ में स्टाम्प कर लागू किया गया यानि उपनिवेशवासियों से कहा गया कि वे किसी भी करार या समझौते को अधिकृत स्टम्प लगे हुए कागजों पर ही लिख सकेंगे इससे उपनिवेशों की जनता मे विद्रोह भडक उठा । उसने स्टाम्प लगे हुए कागजो को स्वीकार करने से मना कर दिया और सरकारी अधिकारियों पर हमले किए । इन लोगों ने यह नारा बुलंद किया “ प्रतिनिधित्व नहीं तो कर भी नहीं ।


" १७६६ में ब्रिटिश सरकार ने स्टाम्प कर वापस ले लिया , और यह घोषणा की कि ब्रिटिश संसद उपनिवेशों पर कर लगाने का कानूनी अधिकार रखती है । अगले ही वर्ष सरकार ने कागज और चाय के आयात पर कर लगा दिया । उपनिवेशों ने आयात शुल्क का भी विरोध किया , क्योंकि इसे उन्होंने अपनी आजादी पर एक प्रहार समझा । वे ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाये गये किसी भी कर के हक में नहीं थे । १७७० में ' बोस्टन के हत्याकांड ' की घटना घटित हुई । वहां अंग्रेज सैनिकों द्वारा गोली चलाये जाने से चार अमेरिकी मारे गए । इस हत्याकांड ने जनता के रोष को और भी बढ़ा दिया । १७७२ में लोगों ने एक शाही जहाज में आग लगा दी । १७७३ में इस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भेजे गए चाय के बक्सों को समुद्र में फेंक दिया । यह घटना ' बोस्टन टी पार्टी ' के नाम से प्रसिद्ध है ।


विद्रोह का दमन करने के लिए ब्रिटिश सरकार को कुछ कड़े कदम उठाने पड़े । उपनिवेशों में अतिरिक्त सैनिक भेजे गए तथा जनसभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया । इस प्रकार उपनिवेश तुरंत विद्रोह करने पर मजबूर हो गये । फिलेडेलफिया नगर में सभी उपनिवेशों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन हुआ इसमें यह मांग की गयी कि सरकार दमनकारी कानूनों को वापस ले । सम्मेलन में अंग्रेजी वस्तुओं के बहिष्कार का निर्णय लिया । ब्रिटिश सरकार के बीच - बचाव के सभी प्रयत्न निष्फल रहे । मई १७७५ में फिलेडेलफिया में एक दूसरा महासम्मेलन हुआ । सम्मेलन ने जॉर्ज वाशिंग्टन को उपनिवेशों की सेना सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया । इस सम्मेलन में टॉमस जैफरसन तथा जॉर्ज डिकिंसन ने प्रस्ताव रखा कि , " हम अंग्रेजों के दास बनकर जीवित रहने की अपेक्षा मर - मिटने का निश्चय कर चुके हैं ।


" ४ जुलाई , १७७६ को सभी उपनिवेशों के प्रतिनिधियों ने औपचारिक रूप से स्वतंत्रता की घोषणा कर दी । घोषणापत्र में यह कहा गया कि " हम इन सत्यों को स्वयंसिद्ध मानते है कि सभी मनुष्य समान उत्पन्न हुए हैं तथा परमात्मा ने उन्हें कुछ ऐसे अधिकार प्रदान किए हैं जो किसी भी अवस्था में उनसे छीने नहीं जा सकते । इन अधिकारों में जीवन का अधिकार , स्वतंत्रता का अधिकार तथा आनंद प्राप्ति के अधिकार शामिल है । " इस ऐतिहासिक दस्तावेज में निम्नलिखित मुद्दों पर बल दिया गया ।


( १ ) सभी उपनिवेश स्वतंत्र है और उन्हें स्वाधीन राज्यों का दर्जा मिलना ही चाहिए ;

( २ ) वे ब्रिटिश सम्राट के प्रति निष्ठा व्यक्त करने को मजबूर नहीं किए जा सकते ;

( ३ ) उनके और ब्रिटेन के बीच समस्त राजनीतिक संबंध समाप्त किए जा रहे है ; तथा

( ४ ) स्वाधीन राज्यों के नाते ये सभी उपनिवेश युद्ध की घोषणा करने , संधि करने व अन्य राष्ट्रो के साथ मैत्री संबंध स्थापित करने का पूरा अधिकार रखते हैं ।


परिसंघ का गठन ( Making of the Confederation ) - उपनिवेशों द्वारा अपनी स्वाधीनता की घोषणा से यह समस्या आयी कि युद्धकाल के दौरान इन राज्यों को एक - दूसरे से मिलाए रखने के लिए क्या कदम उठाए जाएं । इसके लिए उन्होंने एक ' परिसंघ ' का गठन करना चाहा । ' परिसंघ ' का संविधान ' नवंबर , १७७७ में स्वीकार किया गया । स्वाधीनता की लड़ाई लगभग पांच वर्षों तक चलती रही । १७८ ९ में ब्रिटिश जनरल कार्नवालिस को आत्मसमर्पण करना पड़ा । युद्ध लगभग समाप्त हो गया , पर ब्रिटेन ने अमेरिकी स्वतंत्रता को विधिवत मान्यता १७८३ में दी ।


नवंबर , १७७७ में स्वीकृत ' परिसंघ के अनुच्छेदो को संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रथम लिखित संविधान कहा गया है । इस संविधान के कुछ प्रमुख अनुच्छेद है :

प्रथम अनुच्छेद - उपनिवेशों को ' संयुक्त राज्य अमेरिका ' के नाम से पुकारा गया ।

दूसरा अनुच्छेद परिसंघ में शामिल प्रत्येक राज्य संप्रभुता , स्वतंत्रता , शक्ति और समस्त अधिकारों से सिवाय उन अधिकारों के जो स्पष्ट रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका अर्थात केंद्रीय सरकार को दे दिये है और जो संयुक्त राज्य युक्त है , ) अमेरिका की ओर से ' काँग्रेस ' ( Congress ) द्वारा प्रयुक्त किए जायेंगे ।


तीसरा अनुच्छेद - ये राज्य परस्पर मैत्री के पक्के बंधन में बंधे हुए हैं ताकि वे सामूहिक रूप से अपनी रक्षा कर सकें , अपनी सुरक्षा का पक्का बंदोबस्त कर सकें और साझे कल्याण की योजनाएं बनाएं । राज्यों का यह कर्तव्य है कि यदि मजहब , संप्रभुता , व्यापार या अन्य किसी बहाने कोई शत्रु उनमें से किसी पर भी कोई प्रहार करे तो वे एकजुट होकर आक्रमणकारी का मुकाबला करें ।


परिसंघ के अन्य अनुच्छेदों ने ' कांग्रेस ' की स्थापना की , जिसमें सभी राज्यों को प्रतिनिधित्व दिया गया । ' कांग्रेस ' वास्तव में एक केंद्रीय विधानमंडल के रूप में कार्य करती थी । उसके अध्यक्ष को प्रेजिडेंट कहते थे । प्रजिडेंट को कार्यकारी शक्तियां नहीं दी गई थीं । कार्यकारी शक्तियों का उपयोग कांग्रेस की एक समिति किया करती थी । इस समिति में प्रत्येक राज्य से एक प्रतिनिधि लिया जाता था ।


कांग्रेस की मुख्य मुख्य शक्तियां विदेश नीति का संचालन , युद्ध एवं शांति की घोषणा तथा डाक , तार और मुद्रा की व्यवस्था थी ।

परिसंघ द्वारा एक राष्ट्रीय अर्थात् केंद्रीय सरकार का निर्माण अवश्य किया गया । पर वह एक दुर्बल सरकार थी ।


परिसंघ के दोष :

( i ) परिसंघ में सम्मिलित प्रत्येक राज्य अपनी संप्रभुता को बनाए रखने के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक था । वह यदि चाहे तो परिसंघ से अलग भी हो सकता था ।

( ii ) परिसंघ की कार्यपालिका एक नितांत शक्तिहीन संस्था थी । कांग्रेस के अध्यक्ष को कार्यकारी अधिकार हासिल नही थे ।

( iii ) केंद्रीय सत्ता महज एक सलाहकार समिति बनकर रह गई । किसी भी शक्तिशाली केंद्रीय सरकार के पास करों द्वारा धन इकट्ठा करने की शक्ति , ऋण लेने की शक्ति , राज्यों के बीच होने वाले व्यापार को नियमित करने की शक्ति तथा सेना संगठित करने की शक्ति होनी चाहिए । कांग्रेस के पास ये चारों शक्तियां नहीं थी । उसकी आय का भी कोई निश्चित साधन नहीं था । फलस्वरूप राष्ट्रीय जीवन में अराजकता और अव्यवस्था फैल गई ।


वर्तमान संघीय संविधान का निर्माण ( Framing the existing Federal Constitution ) - उपर्युक्त दोषो के कारण संविधान की आलोचना आरंभ हो गई थी । फलस्वरूप एक नया संविधान बनाने के लिए १७८७ में फिलेडेलफिया में एक संवैधानिक सम्मेलन बुलाया गया । सम्मेलन में भाग लेने वाले व्यक्तियों में जॉर्ज वाशिंग्टन , मेडिसन , हेमिल्टन , फ्रँकलिन , जॉर्ज डिकिंसन तथा विल्सन प्रमुख थे । संविधान सभा के समक्ष कई योजनाएं रखी गई । समझौते का सार था कि राष्ट्रीय विधानमंडल के दो सदन होंगे । निचले सदन में प्रत्येक राज्यों को जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया जाएगा , पर उच्च सदन में प्रत्येक राज्य को केवल दो प्रतिनिधि भेजने का अधिकार होगा । भारी वाद - विवाद के बाद १५ सितम्बर , १७८७ को संविधान का प्रारूप स्वीकार कर लिया गया । प्रतिनिधियों में से ३ ९ प्रतिनिधियों ने उस पर अपने हस्ताक्षर किए और इस प्रकार सम्मेलन का कार्य समाप्त हो गया ।


नये संविधान को लागू करने के लिए यह जरूरी था कि कम - से - कम दो - तिहाई राज्यों के विधानमंडलों द्वारा उसका अनुमोदन किया जाए । अभिप्राय यह है कि राज्यों में से ९ राज्यों द्वारा उसकी स्वीकृति आवश्यक थी । २१ जून १७८८ तक १३ में से ९ राज्यों से नये संविधान का अनुसमर्थन कर दिया था । इसलिए संविधान को तत्काल उन ९ राज्यों में लागू कर दिया गया । बाद में शेष राज्यों ने भी उस पर अपनी अनुमति दे दी । संविधान के तहत एक केंद्रीय विधानमंडल ( Congress ) का गठन मार्च , १७८ ९ में किया गया , और उसी वर्ष जॉर्ज वाशिंगटन ने अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति का पद संभाला । इस प्रकार १७८ ९ में नये संविधान का विधिवत श्रीगणेश हुआ ।


जुलाई , १ ९ ७६ में संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की २०० वी वर्षगांठ मनाई । नया संविधान जो १७८ ९ में लागू किया गया था , इतना काल बीत जाने पर भी अपनी मौलिकता को ज्यों का त्यों बनाये हुए है । युद्ध और शांति , संकट व समृद्धि हर तरह की परिस्थितियों से वह गुजरा है और उसका स्वरूप लगातार निखरता ही गया । ब्रिटिश प्रधानमंत्री ग्लैडस्टन ने इस संविधान को ' संसार की अत्यंत अलौकिक कृति ' माना है और संविधान निर्माताओं की बुद्धि तथा उनकी ईमानदारी की भूरि - भूरि प्रशंसा की है ।


आकार , जनसंख्या और प्रभाव में लगातार वृद्धि की प्रक्रिया ( Process of becoming Greater in Size , Number and Influence ) १७८ ९ में अमेरिकी संघ में १३ राज्य शामिल थे , पर धीरे - धीरे संयुक्त राज्य में अनेक क्षेत्र जुडते गये और वह एक महान राष्ट्र बन गया । इस समय अमेरिका का क्षेत्रफल लगभग ९ ८ लाख वर्ग किलोमीटर है और उसमें ५० राज्य शामिल है । उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका का क्षेत्रफल लगातार विस्तृत होता गया ।


राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के शासनकाल ( १८६१-६५ ) के दौरान अमेरिका को एक भयंकर आंतरिक चुनौती का सामना करना पड़ा । अमेरिका के दक्षिणी राज्यों को अपने कृषि फार्मों के लिए गुलामों की जरूरत थी , पर उत्तरी राज्य दास प्रथा के विरुद्ध थे । उत्तर और दक्षिण का खिचाव बढ़ता ही गया । १८६१ में अब्राहम लिंकन ने राष्ट्रपति का पद संभाला । उसने स्पष्ट रूप से यह घोषणा कर दी कि गुलामी की प्रथा को सहन नहीं किया जाएगा । फलस्वरूप ११ दक्षिणी राज्य अमेरिकी संघ से अलग हो गये । १८६१ में गृहयुद्ध छिड़ गया जो पूरे चार वर्ष तक चलता रहा । जब दक्षिणवाले बिल्कुल थक गये तो १८६५ में गृहयुद्ध समाप्त हो गया । युद्ध का केवल यही परिणाम नहीं निकला कि लाखों अश्वेत लोग आजाद हो गये , बल्कि उसने संयुक्त राज्य अमेरिका को छिन्न - भिन्न होने से बचा लिया ।


संक्षेप में उन्नीसवीं शताब्दी में इस महान देश का क्षेत्रफल और आबादी ही नहीं बढ़ी , उसके उद्योग , व्यापार , धन और प्रभाव में भी अपार वृद्धि हुई ।


उदारवाद व लोकतंत्रीय शासन की परंपरा ( Tradition of Liberalism and of Democratic Govern ment ) अमेरिकी शासन व्यवस्था को " बहुलवादी लोकतंत्र " की संज्ञा दी जाती है , जिसके कुछ विशेष लक्षण इस प्रकार है :

( i ) नागरिकों को राजनीतिक दलों के निर्माण की छूट है । दो बडे राष्ट्रीय दलों - रिपब्लिकन पार्टी व डेमोक्रेटिक पार्टी - के अलावा राज्य स्तर पर कई छोटे - छोटे दल विद्यमान है , जैसे सोशलिस्ट पार्टी , सोशलिस्ट - लेबर पार्टी तथा मद्य निषेध पार्टी । राजनीतिक दल राजनीतिक सत्ता के लिए खुलकर प्रतियोगिता कर सकते है ।

( ii ) बालिग मताधिकार पर आधारित चुनाव समय - समय पर होते रहते है । राष्ट्रपति का चुनाव हर चार वर्ष बाद होता = , केंद्रीय विधानमंडल के निचले सदस्य यानी ' प्रतिनिधि सभा ' का कार्यकाल दो वर्ष है तथा सीनेट के सदस्यों का चुनाव ६ वर्ष के लिए होता है । इन चुनावों में ऐसा हर व्यक्ति वोट देने का अधिकारी है , जो कम - से - कम १८ वर्ष की आयु का हो ।

( iii ) सरकारी निर्णयों को प्रभावित करने के लिए दबाव गुटों को कार्य करने का अवसर मिलता है । मजदूर यूनियनों था अन्य समुदायों पर सरकार का कड़ा नियंत्रण नहीं है ।

( iv ) नागरिकों को बहुत से अधिकार व नागरिक स्वतंत्रताएं प्राप्त हैं , जैसे भाषण व सभा - सम्मेलन की स्वतंत्रता , ार्मिक स्वतंत्रता , मनमाने ढंग से बंदी न बनाए जाने का अधिकार तथा व्यवसाय व कारोबार की स्वतंत्रता । न्यायपालिका चाधीन है । •

( v ) जन - संपर्क माध्यमों , जैसे - रेडियो , टेलीविजन व अखबारों पर सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं है ।

( vi ) केंद्रीय सरकार के तीनों अंगों : राष्ट्रपति , कांग्रेस ( विधानमंडल ) और उच्चतम न्यायालय - को सीमित शक्तियां दान की गई हैं । इतना ही नहीं तीनों अंग एक - दूसरे पर नियंत्रण रखते हैं , ताकि प्रत्येक विभाग की शक्तियां संतुलित रहें । इसे नवरोध व संतुलन ' का सिद्धांत कहते हैं ।


गणतंत्र और संघीय शासन की परंपरा ( Tradition of Republicanism and Federalism ) संविधान भा के सर्वाधिक प्रभावशाली सदस्य मेडिसन ' गणतंत्र ' को परिभाषित करते हुए लिखते है " गणतंत्र वह सरकार हैं जो परोक्ष या यक्ष रूप से समस्त सत्ता ' जनता ' से ही प्राप्त करती है । राजसत्ता का प्रयोग करने वाले व्यक्ति जनता द्वारा एक निश्चित अवधि लिए चुने जाते हैं अथवा वे ' सदाचार पर्यंत ' ( during good behaviour ) अपने पद पर कायम रह सकते हैं । " • मेडिसन के मतानुसार गणतंत्र शासन की तीन विशेषताएँ है :

( i ) जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों का शासन ( representative government )

( ii ) जिम्मेदारी की भावना से काम करने वाली सरकार ( responsible government )

( iii ) लोकप्रिय सरकार ( popular government )


सीनेटीय शिष्टता ( Senatorial Courtesy ) - वर्तमान समय मे अमेरिकन शासन व्यवस्था से सीनेटीय शिष्टता enatorial Courtesy ) के नाम से संबोधित की जानेवाली राजनैतिक परंपरा का निर्माण हुआ है । इसका तात्पर्य यह है कि पति संबंधित राज्य के सीनेट सदस्यों के परामर्श के आधार पर ही नियुक्तियाँ करे । वैसे तो अमेरिकी राष्ट्रपति को नियुक्ति से संबंधित व्यापक अधिकार प्राप्त है । उदा : मंत्री , अमेरिका के अन्य राष्ट्रों मे दूत , सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश , सेना के सर्वोच्च अधिकारी आदि विभिन्न पदों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है । राष्ट्रपति द्वारा की गयी प्रत्येक नियुक्ति को जब तक सीनेट की मान्यता प्राप्त नही होती तब तक नियुक्तियों को अंतिम स्वरूप का नहीं समझा जाता है । सीनेटीय शिष्टाचार के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा की गयी नियुक्ति को संबंधित घटक राज्यों के दो प्रतिनिधियों यदि मान्यता प्राप्त होगी , तभी सीनेट उस नियुक्ति का समर्थन करती है । जब - जब राष्ट्रपति ने सीनेटीय शिष्टता की इस परंपरा तोडने को कोशिश की , राष्ट्रपति द्वारा की गयी नियुक्तियों को सीनेट ने अस्वीकार कर दिया ।


संविधान निर्माताओं ने कार्यपालिका के अध्यक्ष यानी ' राष्ट्रपति ' को शक्तिशाली तो अवश्य बनाया , पर साथ ही इस बात भी पूरा प्रबन्ध किया कि राष्ट्रपति निरंकुश न बन सके । राष्ट्रपति द्वारा की गई नियुक्तियों या संधियों पर ' सीनेट ' की स्वीकृति आवश्यक है ।






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