महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का इतिहास
- स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका - महिलाओं ने सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन और अन्य आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई। इन आंदोलनों ने महिलाओं को राजनीतिक जागरूकता और नेतृत्व के अवसर प्रदान किए।
- संविधान में महिलाओं के अधिकार - भारतीय संविधान ने महिलाओं को समान राजनीतिक अधिकार दिए, जिसमें मतदान का अधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार शामिल है। यह महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की नींव बनी।
भारत की प्रमुख महिला राजनीतिक नेताओं का एक संक्षिप्त और सुव्यवस्थित विवरण दिया गया है:
| नेता | प्रमुख पद | मुख्य पहचान / योगदान |
| इंदिरा गांधी | प्रथम महिला प्रधानमंत्री | सुदृढ़ इच्छाशक्ति, साहसिक निर्णय (जैसे 1971 का युद्ध) और लंबे समय तक नेतृत्व। |
| प्रतिभा पाटिल | प्रथम महिला राष्ट्रपति | देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद को सुशोभित करने वाली पहली महिला (2007-2012)। |
| द्रौपदी मुर्मू | वर्तमान राष्ट्रपति | भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति; जमीनी संघर्ष से सर्वोच्च पद तक का सफर। |
| सुचेता कृपलानी | प्रथम महिला मुख्यमंत्री (UP) | भारत के किसी भी राज्य का नेतृत्व करने वाली पहली महिला (1963)। |
| जयललिता | पूर्व मुख्यमंत्री (तमिलनाडु) | 'अम्मा' के नाम से लोकप्रिय; ऐतिहासिक लोक-कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत। |
| मायावती | पूर्व मुख्यमंत्री (UP) | चार बार मुख्यमंत्री; वंचित और दलित वर्गों का राजनीतिक सशक्तीकरण। |
| ममता बनर्जी | वर्तमान मुख्यमंत्री (पश्चिम बंगाल) | बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री; 34 साल के कम्युनिस्ट शासन को समाप्त किया। |
| शीला दीक्षित | पूर्व मुख्यमंत्री (दिल्ली) | दिल्ली की 15 साल तक मुख्यमंत्री; मेट्रो की शुरुआत और बुनियादी ढांचे का आधुनिकरण। |
| सुषमा स्वराज | पूर्व विदेश मंत्री | सोशल मीडिया के जरिए विदेशों में फंसे भारतीयों की त्वरित मदद और कुशल वक्तृत्व। |
| सरोजिनी नायडू | प्रथम महिला राज्यपाल (UP) | स्वतंत्रता सेनानी और स्वतंत्र भारत में पहली महिला राज्यपाल। |
नारीवाद से आप क्या समझते है । नारीवादी आंदोलन के उदय एवं विकास का वर्णन कीजिए ।
नारीवाद आधुनिक युग की एक महत्त्वपूर्ण विचारधारा तथा आन्दोलन है । प्राचीनकाल से ही नारियों के साथ विभिन्न क्षेत्रों में भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता रहा है । इस भेदभावपूर्ण व्यवहार के कारण नारियाँ समाज में अपनी भूमिका निभाने में काफी हद तक असमर्थ रही है । आरंभ से ही समाज पुरुष प्रधान रहा है जिसमें महिलाओ को दासी समझा जाता था और उसे पुरुष के समान अधिकारों से वंचित रखा जाता था ।
महिलाओं का क्षेत्र घर की चारदीवारी तक ही सीमित रखा गया था । उसको सिर्फ पुरुषों की सेवा करना , घर का कामकाज करना , सन्तान पैदा करना और उनका पालन पोषण करना जैसा कार्य ही सौंपा गया था । अनेक धार्मिक ग्रन्थों ने भी स्त्रियों द्वारा पुरुषों के अधीन रहने और उनके निर्देशन में काम करने का समर्थन किया है । पुरुषों द्वारा प्रायः नारियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता रहा है जिसे प्रत्यक्ष रूप में आज भी देखा जा सकता है । नारियों की यह स्थिति केवल पिछड़े देशों में नहीं बल्कि विकसित देशों में भी मिलती है , जहाँ उन्हें पुरुषों के समाज दर्जा नहीं दिया जाता । यद्यपि आज विश्व के लगभग सभी देशों में संविधान तथा कानून द्वारा स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार दिये गये हैं ; परन्तु व्यवहार में आज भी वे निर्णय निर्माण प्रक्रिया ( Decision Making Process ) में बराबर की भागीदार नहीं है और उनके बारे में अधिकांश निर्णय पुरुषों द्वारा ही लिये जाते हैं । यद्यपि आज भी स्त्रियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जा रहा है , परन्तु आज उनमें जागृति आ गई है और उन्होंने अपने को संगठित करके पुरुषों के समान अधिकार तथा उनसे समानता प्राप्त करने के लिये संघर्ष करना आरम्भ कर दिया है ।
नारीवाद से क्या समझा जाता है
महिलाओं ने अपने हितों की सुरक्षा के लिये चलाये गये आन्दोलन को ही ' नारीवाद ' ( Feminism ) नाम दिया गया है । " स्त्रीवाद / नारीवाद की उत्पत्ति ( Origin of Feminism ) : नारीवाद ( Feminism ) शब्द की उत्पत्ति अंग्रेजी भाषा के शब्द ' Female ' से हुई है । ' Female ' का अर्थ है कि ' स्त्री ' अथवा ' स्त्री सम्बन्धी ' । अतः ' स्त्रीवाद ' एक ऐसा आन्दोलन है जिसका सम्बन्ध स्त्रियों के हितों की रक्षा से है । स्त्रीवाद / नारीवाद की परिभाषायें ( Definitions of Feminism ) विभिन्न विद्वानों में नारीवाद ' को अपने - अपने दृष्टिकोणों से परिभाषित किया है । कुछ विभिन्न परिभाषायें निम्नानुसार हैं
ऑक्सफोर्ड शब्दकोष ( Oxford Dictionary ) के अनुसार , " नारीवाद स्त्रियों के अधिकारों की मान्यता , उनकी उपलब्धियों और अधिकारों की वकालत हैं ।
" - प्रसिद्ध समाजशास्त्री मेरी एवोस ( Mary Evous ) ने लिखा है कि " नारीवाद स्त्रियों की वर्तमान तथा भूतकाल की स्थिति का आलोचनात्मक मूल्यांकन है । यह स्त्रियों से संबंधित उन मूल्यों के लिये चुनौती है जो स्त्रियों को दूसरों के द्वारा प्रस्तुत की जाती है ।
" चारलोट बंच ( Carlotte Bunch ) के शब्दों में , " नारीवाद से अभिप्राय उन विभिन्न सिद्धान्तों और आन्दोलनों से है जो पुरुष की तरफदारी का विरोध तथा पुरुष के प्रति स्त्री की अधीनता की आलोचना करते हैं । जो लिंग पर आधारित अन् को समाप्त करने के लिये वचनबद्ध है ।
" जान चारवेट ( John Charvet ) के अनुसार , " नारीवाद का मूल सिद्धान्त यह है कि मौलिक योग्यता के पक्ष से पुरुषों तथा स्त्रियों से कोई अन्तर नहीं है । इस पक्ष में कोई भी पुरुष प्राणी अथवा स्त्री प्राणी नहीं है , बल्कि वे मानवीय प्राणी है । मनुष्य का स्त्रीत्व तथा महत्त्व लिंग के पक्ष से स्वतन्त्र हैं ।
नारीवादी आंदोलन का उदय
नारीवादी आंदोलन का इतिहास कई चरणों में विभाजित किया जा सकता है। इसका प्रारंभ 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के प्रारंभ में हुआ, जब महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आवाज उठानी शुरू की।
प्रथम लहर नारीवाद
पहली लहर नारीवाद का मुख्य फोकस महिलाओं को मतदान का अधिकार दिलाना था। यह आंदोलन मुख्यतः पश्चिमी देशों में शुरू हुआ। 1848 में अमेरिका के सेनेका फॉल्स सम्मेलन को नारीवादी आंदोलन की शुरुआत माना जाता है। इस सम्मेलन में महिलाओं ने समान मतदान अधिकार, शिक्षा और रोजगार के अवसरों की मांग की।
भारत में भी इस दौर में महिलाओं की स्थिति पर ध्यान दिया गया। सामाजिक सुधारकों जैसे राजा राम मोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने महिलाओं के अधिकारों के लिए काम किया। बाल विवाह, सती प्रथा और विधवा पुनर्विवाह जैसे मुद्दे सामने आए।
दूसरी लहर नारीवाद
20वीं सदी के मध्य में दूसरी लहर नारीवाद ने महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक अधिकारों पर जोर दिया। इस दौर में महिलाओं ने केवल वोटिंग अधिकार ही नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, परिवार और यौन स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर भी संघर्ष किया।
यह लहर महिलाओं के लिए बेहतर कार्यस्थल, समान वेतन, यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानून और गर्भपात के अधिकार की मांग लेकर आई। इस दौर में फेमिनिस्ट लेखिकाओं और कार्यकर्ताओं ने महिलाओं की स्थिति पर गहराई से विचार किया।
तीसरी लहर नारीवाद
" महाकोष इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका ( Encyclopaedia Britianica ) के अनुसार , " नारीवाद एक ऐसी धारणा है जिसका जन्म थोड़े समय पूर्व ही हुआ है । यह धारणा उन उद्देश्यो तथा विचारों का प्रतिनिधित्व करती है जो स्त्रियों के अधिकारों के पक्ष में चलाये गये आन्दोलनों के साथ सम्बन्धित हो । इसमें आन्दोलन के निजी , सामाजिक , राजनीतिक तथा आर्थिक पक्ष शामिल हैं तथा इसका उद्देश्य स्त्रियों को पुरुषों के समान पूर्ण समानता के स्तर पर लाना हैं । "मताधिकार के साथ ही अपना लिया गया , लेकिन फ्रांस , इटली , बेल्जियम , पर्तुगाल व स्पेन में महिलाओं को मताधिकार प्राप्त करने के लिए द्वितीय विश्वयुद्ध तक प्रतीक्षा करनी पड़ी । ये सभी देश पूर्ण रूप से रोमन कैथोलिक्स के प्रभाव में थे । / वस्तुतः ईसाइयत और इस्लाम के नाम पर महिला मताधिकार का बहुत विरोध हुआ । द्वितीय महायुद्ध के बाद लोकतान्त्रिक मताधिकार ( स्त्री - पुरुष सभी वयस्क व्यक्तियों को मताधिकार ) के सिद्धान्त को लगभग प्रत्येक यूरोपीयन देश द्वारा अपना लिया गया था । स्विट्जरलैण्ड जैसे देश ही इसके अपवाद थे , जहां १ ९ ७० ई . तक महिलाओं को मताधिकार से वंचित रखा गया । एक अन्य तथ्य यह है कि कुछ देश महिलाओं को मताधिकार प्रदान करने के बाद भी महिलाओं की अपेक्षित राजनीतिक अयोग्यता ' की धारणा को अपनाए रहे । उदाहरण के लिए न्यूजीलैण्ड में महिलाओं को मताधिकार १८ ९ ३ ई . में प्रदान कर दिया गया , लेकिन उन्हें प्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित होने का अधिकार १ ९ १ ९ ई . में Women's Parliamen tary Rights Act ' द्वारा प्रदान किया गया ।
फिनलैण्ड ऐसा पहला राज्य था , जिसने महिलाओं को एक साथ दोनों अधिकार ( मताधिकार और प्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित होने का अधिकार ) १ ९ ०६ ई . में प्रदान किए । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ' मानव अधिकार आन्दोलन ' इतना प्रबल हो गया था कि भारत और अन्य अनेक देशों में ' वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त ' ( स्त्री पुरुष दोनों के लिए समान राजनीतिक अधिकार ) लगभग बिना किसी विरोध और विवाद के स्वीकार कर लिया गया । आज विश्व के लगभग सभी लोकतान्त्रिक देशों में वयस्क मताधिकार को अपना लिया गया है । महिलाओं को पुरुषों के समान ही प्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित होने का अधिकार भी प्राप्त है । व्यवहार के अन्तर्गत चुनावों में महिलाओं की भागीदारी और उनकी भूमिका निरन्तर बढ़ रही है , लेकिन निर्वाचित प्रतिनिधि संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व और सम्पूर्ण रूप से राजनीतिक प्रक्रिया पर उनका प्रभाव बहुत कम है ।
एक सर्वेक्षण में बताया गया है कि विभिन्न देशों की संसदों ( व्यवस्थापिका सभाओं ) में कुल मिलाकर महिलाओं को १५.१ प्रतिशत प्रतिनिधित्व ( ४० , ३०४ में से ६,०६ ९ स्थान ) ही प्राप्त हैं और मन्त्रिपरिषदों में तो उन्हें कुल मिलाकर ६ प्रतिशत स्थान ही प्राप्त है । में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में केवल यही बात सम्मिलित नहीं है कि महिलाएं मत दें , प्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित हों , राजनीतिक समुदायों को समर्थन दे और विधायकों से सम्पर्क स्थापित करें , वरन् राजनीतिक भागीदारी में उन सभी संगठित गतिविधियों को सम्मिलित किया जा सकता है जो शक्ति सम्बन्धों को प्रभावित करता है या प्रभावित करने की चेष्टा करता है । शासक वर्ग का सक्रिय समर्थन , विरोध या प्रदर्शन भी राजनीतिक भागीदारी का अंग है । सार्थक भूमिका के लिए राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की कितनी भागीदारी होनी चाहिए , इस सम्बन्ध में ' महिलाओं की प्रस्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग ' ने १ ९९ ० ई . में सुझाव दिया है कि निर्णय लेने वाली संरचनाओं में महिलाओं की भागीदारी कम से कम ३० प्रतिशत होनी चाहिए । इसके बाद १ ९९ ५ ई . में इस बात पर चिन्ता भी व्यक्त की गई है कि ' आर्थिक और सामाजिक परिषद द्वारा अनुमोदित ३० प्रतिशत भागीदारी का लक्ष्य कहीं पर भी प्राप्त नहीं किया जा सका है ।
नारीवादी आंदोलन के विकास के चारों चरणों (Waves) की एक संक्षिप्त और स्पष्ट तालिका दी गई है
| चरण (Wave) | समयावधि | मुख्य केंद्र | मुख्य मुद्दे और मांगें | प्रमुख परिणाम / आंदोलन |
| प्रथम चरण | 19वीं सदी का अंत - 20वीं सदी की शुरुआत | अमेरिका और ब्रिटेन | * कानूनी अधिकार * मताधिकार (Right to Vote) * संपत्ति का अधिकार | अमेरिका (1920) और ब्रिटेन (1928) में महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला। |
| द्वितीय चरण | 1960 - 1980 का दशक | पश्चिमी दुनिया और वैश्विक | * सामाजिक व सांस्कृतिक असमानता * कार्यस्थल पर भेदभाव * प्रजनन अधिकार (जैसे गर्भपात) * घरेलू हिंसा | "व्यक्तिगत ही राजनीतिक है" का नारा प्रसिद्ध हुआ; महिलाओं के सामाजिक अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी। |
| तृतीय चरण | 1990 का दशक | वैश्विक और समावेशी | * अंतर्विभाजकता (Intersectionality) * नस्ल, जाति और वर्ग के आधार पर महिलाओं के अलग अनुभव * यौन स्वतंत्रता | आंदोलन में श्वेत महिलाओं के अलावा अश्वेत, विभिन्न जातियों और वर्गों की महिलाओं को भी प्रतिनिधित्व मिला। |
| चतुर्थ चरण | 2012 - वर्तमान | डिजिटल दुनिया (इंटरनेट/सोशल मीडिया) | * यौन उत्पीड़न और सुरक्षा * बॉडी शेमिंग * डिजिटल एक्टिविज़्म | #MeToo और #TimesUp जैसे वैश्विक आंदोलन, जिन्होंने कार्यस्थलों और समाज में जवाबदेही तय की। |
नारीवादी आंदोलन के प्रमुख उदाहरण
- सेंका फॉल्स सम्मेलन (1848): महिलाओं के अधिकारों के लिए पहला बड़ा सम्मेलन।
- भारत में विधवा पुनर्विवाह आंदोलन: सामाजिक सुधारकों द्वारा विधवाओं के पुनर्विवाह की मांग।
- मीराबाई चानू और अन्य महिला खिलाड़ियों का संघर्ष: खेल में महिलाओं की भागीदारी और समानता की मांग।
- #MeToo आंदोलन: यौन उत्पीड़न के खिलाफ वैश्विक स्तर पर महिलाओं की आवाज।
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