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भारत दल - बदल की राजनीति [

भारत दल - बदल की राजनीति

POLITICS OF DEFECTION IN INDIA


हल ही में हमारे देश में जिस प्रकार राजनीती का तथा राजनितिक पार्टियों का विकास हो रहा इसीसे राजनीती में हमारे समक्ष दाल बदल की राजनीती बहुत तेजी के साथ विकसित हो रही कुछ राजनितिक विशेष्यज्ञों का मानना है यहाँ क्या राजनीती का अंत या विकास इसे समझने के लिए आप सभी को पहले यहाँ समझना होगा के आखिर राजनीती में दाल बदल क्यों होता है तथा इस का मकसद देश हित में है या नहीं डॉ . सुभाष कश्यप ने इस आपने शब्दों में समझने की कोशिश की के जिस आसानी से वे एक दल का परित्याग कर दूसरे दल में सम्मिलित होते हैं उससे एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि वे किसी राजनीतिक सिद्धान्त अथवा किसी दल की राजनीतिक विचारधारा को अधिक महत्त्व नहीं देते ।



राजनीतिक अर्थों में दल - बदल का अर्थ होता है किसी निर्वाचित व्यक्ति का उस राजनीतिक दल को , जिसके टिकट पर वह निर्वाचित हुआ है , छोड़कर किसी अन्य दल में सम्मिलित होना अथवा दल की सदस्यता त्यागे बिना ही उस दल के विरुद्ध मतदान करना अथवा उसके द्वारा नया दल बना लेना । इस दल - बदल की राजनीति को इंग्लैण्ड में फ्लोर क्रोसिंग कहा जाता है ।





इंग्लैण्ड में कॉमन सभा ( House of Commons ) में विरोधी दल तथा सरकारी दल के सदस्य आमने - सामने बैठते हैं और यदि उनमें से किसी दल का सदस्य एक ओर से दूसरी ओर जाता है तो उसे बीच के रास्ते को पार करके जाना होता है । इसलिए इस प्रक्रिया को ' फ्लोर क्रॉसिंग ' ( Floor Crossing ) कहा जाता है ।


इसी प्रकार नाइजीरिया में इसे कार्पेट क्रासिंग ( Carpet Crossing ) कहते हैं क्योंकि नाइजीरिया में सत्ता पक्ष और विपक्ष के अलग - अलग कार्पेट ( कालीन ) होते हैं और किसी व्यक्ति को पक्ष बदलने के लिए अपना कार्पेट बदलना पड़ता है । दल - बदल को कुछ विद्वानों ने राजनीतिक अवसरवादिता ( Political Opportunism ) , अस्थिरता की राजनीति ( Politics of Instability ) , अव्यवस्था की राजनीति ( Politics of Confusion ) , विचलन को राजनीति ( Politics of Deviation ) , राजनीतिक कोट बदलने की राजनीति ( Political Turn cotism ) भी कहा है ।


परिभाषाएँ ( Definitions )

दल - बदल की परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

जयप्रकाश नारायण के शब्दों में , “ एक विधान मण्डल के लिए निर्वाचित कोई भी सदस्य , जिसे किसी राजनीतिक दल का सुरक्षित चुनाव चिह्न मिला था , यदि वह चुने जाने के बाद उस राजनीतिक दल से अपना सम्बन्ध तोड़ लेने या उसमें अपनी आस्था समाप्त करने की घोषणा करता है तो उसे दल - बदल ही समझा जाना चाहिए , बशर्ते इसकी कार्यवाही सम्बद्ध पार्टी के फैसले के अनुसार न हो ।


" डॉ . सुभाष कश्यप के शब्दों में , " किसी विधायक का अपने दल अपना निर्दलीय मंच का परित्याग कर किसी अन्य दल में जा मिलना तथा दल बना लेना या निर्दलीय स्थिति अपना लेना अथवा अपने दल की सदस्यता त्यागे बिना ही बुनियादी मामलों में उसके विरुद्ध मतदान करना दल - बदल कहलाता है । " उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि दल - बदल में निम्नलिखित कार्य आते हैं-


( i ) यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष दल की टिकट पर चुना गया हो तथा उसने अपनी इच्छा से उस दल की सदस्यता त्याग कर दूसरे दल में सम्मिलित हो गया हो ।


( ii ) निर्दलीय चुनाव लड़ा व्यक्ति जीतने के पश्चात् किसी दल में सम्मिलित हो गया हो ।


( iii ) यदि किसी दल - विशेष की टिकट पर चुनाव लड़ा व्यक्ति जीतने के पश्चात् निर्दलीय बन जाये ।

( iv ) जब कोई व्यक्ति चुनाव किसी दल की टिकट पर लड़े परन्तु सदन में अपने दल की नीतियों के विरुद्ध मतदान करे ।


1967 तक दल - बदल की घटनाएँ ( Events of Defection upto 1967 )

भारतीय राजनीति में दल - बदल की घटनाएँ 1967 के आम चुनावों से पहले तक बहुत कम हुईं । सबसे पहले दल - बदल को प्रोत्साहन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दिया । उसके अकाली दल के ज्ञानी करतार सिंह , सरदार स्वर्ण सिंह , सरदार हुक्म सिंह आदि को पद का लालच देकर तोड़ लिया । कांग्रेस ने जनसंघ में से पं . • मौलिचन्द्र शर्मा को और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता को दल - बदल कराकर अपने साथ मिला लिया । अगस्त 1958 में उत्तर प्रदेश विधान सभा के 98 विधायकों ने मुख्यमंत्री डा . सम्पूर्णानन्द में अविश्वास व्यक्त करके उन्हें अल्प मत में लाकर पदत्याग के लिए विवश कर दिया । 1962 में मद्रास ( चेन्नई ) के राज्यपाल श्री प्रकाश ने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को अल्प मत में होते हुए भी मुख्यमंत्री बनाने के लिए आमंत्रित किया और 16 विपक्षी सदस्यों ने दल - बदल करके कांग्रेस में सम्मिलित होकर उन्हें बहुमत दिला दिया । 2 सितम्बर , 1964 को केरल में कांग्रेस के 15 विधायकों ने कांग्रेस से दल - बदल करके आर . शंकर के मन्त्रिमण्डल का पतन करा दिया । 1952 में राजस्थान में , 1957 में उड़ीसा में दल - बदल कराकर अपनी सरकारें बनायीं ।


1967 के बाद दल - बदल की घटनाएँ ( E vents of Defection after 1967 )

1967 के आम चुनावों के पश्चात् भारत में दल - बदल इतनी तेजी से होना शुरू हुआ कि यह राजनीति के लिए एक गम्भीर समस्या बन गया । चौथे आम चुनाव - 1967 के पश्चात् कांग्रेस दल के राजनीतिक एकाधिकार का अन्त हो गया और 16 राज्यों में से 8 राज्यों में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला ये राज्य थे बिहार , केरल , तमिलनाडु , उड़ीसा , पंजाब , राजस्थान , उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बंगाल । इनमें से छह राज्यों में विपक्षी दलों ने न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर संयुक्त सरकारें बनायीं । कुछ राज्यों में कांग्रेस पार्टी को सीमान्त बहुमत मिला और किसी तरह कांग्रेस मन्त्रिमण्डलों का निर्माण किया ऐसे राज्यों में विपक्षी दलों ने सामूहिक प्रयत्नों द्वारा कांग्रेसी सरकारों को अपदस्थ करने का अभियान चलाया । चुनाव के तुरन्त पश्चात् उत्तर प्रदेश , हरियाणा तथा मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी ने मन्त्रिमण्डल बनाये , परन्तु कांग्रेस में तोड़ - फोड़ के कारण उनका पतन हो गया और विपक्षी दलों ने मिश्रित सरकारों का गठन किया । आरम्भ में विपक्षी दलों ने कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बाहर रखने का लक्ष्य बनाया और जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बनी हुई थी उन्हें गिराने के लिए सामूहिक प्रयत्न करने का निश्चय किया । इसके लिए दल - बदल को साधन बनाया गया जिसके परिणामस्वरूप देश के 17 राज्यों में से 9 राज्यों में गैर - कांग्रेसी मिश्रित सरकारें बनीं । लेकिन ये सरकारें अधिक नहीं चल पायीं और शीघ्र ही इनका पतन हो गया और उन राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया । इनका राज्यवार विवरण निम्न प्रकार है के कारण



हरियाणा — 1967 के आम चुनावों में कांग्रेस को 81 में से 48 स्थान मिले और स्पष्ट बहुत भगवत दयाल शर्मा ने अपना मन्त्रिमण्डल बनाया । परन्तु एक सप्ताह बाद ही विधान सभा के स्पीकर के चुनाव में कांग्रेस पार्टी का उम्मीदवार तीन मतों से पराजित हो गया । असन्तुष्ट कांग्रेसी विधायकों ने कांग्रेस पार्टी से अलग होकर नवीन हरियाणा दल बनाया । कांग्रेस पार्टी ने नवीन हरियाणा दल के साथ मिलकर संयुक्त मोर्चे की सरकार का गठन किया लेकिन इस बार मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा के स्थान पर राव वीरेन्द्र सिंह को बनाया गया जो नवीन हरियाणा दल के नेता थे । नवीन हरियाणा दल के अनेक सदस्यों को मन्त्रिमण्डल में स्थान दिया गया । वह विधान मण्डल अधिक दिन तक नहीं चल सका । विधान सभा के 8 माह के कार्यकाल में कांग्रेस पार्टी के 31 विधायकों ने दल - बदल किया । एक विधायक ने पाँच बार दल - बदल किया । विधायक गयालाल ने 15 दिन में तीन बार दल - बदल किया जिससे ' गया राम - आया राम ' का नारा राजनीति में प्रचलित हुआ । एक नेता रणधीर सिंह ने टिप्पणी करते हुए कहा कि , " यह शर्म की बात है कि मुख्यमंत्री राव वीरेन्द्र सिंह विधायकों को खरीद रहे हैं और प्रत्येक विधायक को नकद दहेज के साथ - साथ मन्त्रि पद का भी लालच दिया जा रहा है ताकि वे मुख्यमंत्री बने रह सकें ।

उत्तर प्रदेश

" उत्तर प्रदेश – चौथे आम चुनावों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका । कांग्रेस ने अन्य दलों से छोड़कर आने वाले कुछ विधायकों के सहयोग से चन्द्रभानु गुप्त ने मन्त्रिमण्डल बनाया । चौ . चरण सिंह कांग्रेस दल के विधायक थे । वे तत्कालीन मुख्यमंत्री चन्द्रभानु गुप्त पर अपने 13 सदस्यों को मन्त्रिमण्डल में सम्मिलित करने पर जोर दे रहे थे जिसे मुख्यमंत्री ने स्वीकार नहीं किया । परिणामतः चौ . चरण सिंह ने घोषणा करके एक नये दल ' जन कांग्रेस ' का गठन किया और उसके साथ 17 विधायक विपक्ष में जा मिले । चन्द्रभानु गुप्त की सरकार 18 दिन में धाराशाही हो गयी चरण सिंह ने कुछ ही दिनों बाद ' भारतीय क्रान्ति दल ' ( BKD ) गठन किया । कुछ दिनों बाद उन्होंने संयुक्त विधायक दल संविद ( SVD ) को सरकार का निर्माण किया ये सरकार भी आन्तरिक दरारों से शीघ्र गिर गयी । उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया ।

बिहार

बिहार - चौथे आम चुनाव के पश्चात् बिहार में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला । 1967 से 1969 तक राज्य में 6 बार मन्त्रिमण्डल बने और गिरे । इस बीच में दल - बदल की घटनाएँ 200 से अधिक हुई और परिणामतः राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया ।

पंजाब

पंजाब चौथे आम चुनाव के पश्चात् पंजाब में सात गैर - कांग्रेसी दलों और निर्दलीय सदस्यों ने मिली जुली सरकार का गठन किया । कांग्रेस पार्टी और विपक्ष ने इसे गिराने का प्रयास किया । 1 नवम्बर , 1967 में लक्ष्मन सिंह गिल के नेतृत्व में 17 विधायकों ने मोर्चा छोड़ दिया जिससे मिली - जुली सरकार गिर गयी । श्री में गिल ने कांग्रेस की सहायता से सरकार बनायी जो लगभग 9 माह ही चल सकी और 1968 में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया । फरवरी 1969 में हुए नये चुनावों में अकाली - जनसंघ संयुक्त मोर्चे ने सरकार बनायी जो 13 जून , 1971 तक चलती रही ।

राजस्थान

राजस्थान- 1967 के आम चुनावों में कांग्रेस को राजस्थान विधान सभा में 89 स्थान मिले । विपक्ष से दल - बदल होकर कांग्रेस की संख्या 110 हो गयी । सुखाड़िया को मुख्यमंत्री बनाया गया । कांग्रेस ने दल - बदलुओं को अपने दल में सम्मिलित होने के लिए बढ़ावा दिया । दल - बदलुओं का आरोप लगने के बाद भी सुखाड़िया अपना कार्यकाल पूरा कर गये ।

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश - चौथे आम चुनाव के पश्चात् कांग्रेस को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ और 8 मार्च , 1967 को डी . पी . मिश्र ने सरकार बनायी । 19 जुलाई को गोविन्द नारायण सिंह ने अपने 35 विधायकों के साथ दल - बदल किया जिससे मिश्र की सरकार अल्प मत में आने से गिर गयी । 20 जुलाई को गोविन्द नारायण सिंह ने विपक्ष से मिलकर संयुक्त मोर्चे की सरकार बनायी जो मार्च 1969 तक चली । बाद में गोविन्द नारायण सिंह अपने दल - बदलुओं के साथ कांग्रेस पार्टी में फिर से सम्मिलित हो गये और कांग्रेस की सरकार बन गयी । पश्चिम बंगाल – चौथे आम चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल में बंगला कांग्रेस के नेता अजय मुखर्जी ने चौदह दलों की संयुक्त मोर्चा सरकार बनायी जो अधिक नहीं चल सकी । उसके एक घटक के नेता पी . सी . घोष ने 17 अन्य सदस्यों के साथ अपने को इससे अलग कर लिया जिससे संयुक्त मोर्चे की सरकार गिर गयी । बाद में पी . सी . घोष अल्पसंख्यक मन्त्रिमण्डल कांग्रेस और अन्य दल - बदलुओं के साथ बनाया जो अधिक शीघ्र ही गिर गया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा । कर्नाटक - दल - बदल के कारण कर्नाटक के मुख्यमंत्री वीरेन्द्र पाटिल को अपनी 34 महीने पुरानी सरकार का त्यागपत्र देना पड़ा ।

गुजरात

गुजरात- गुजरात में हितेन्द्र देसाई ने दल - बदल के कारण अल्प मत में आ जाने के कारण अपना त्यागपत्र दे दिया । उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मार्च , 1967 से दिसम्बर , 1967 तक , नौ माह की अवधि में , राज्य विधान मण्डलों के कुल 3,447 सदस्यों ( हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा के सदस्यों को छोड़कर ) में से 314 सदस्यों ने ( जो कुल संख्या का लगभग 99 % है ) दल - बदल किया । इनमें निर्दलीय सदस्य भी सम्मिलित थे जो राजनीतिक पद अथवा धन के लोभ में पार्टियाँ बदलते रहे । एक सर्वेक्षण के अनुसार अप्रैल , 1969 तक दल - बदल को लगभग 1,000 घटनाओं में 350 सदस्यों ने भाग लिया । दल - बदल करने वालों में कुछ ऐसे सदस्य भी थे जिन्होंने एक से अधिक बार दल - बदल किया । एक तथ्य यह भी है कि 1957 से 1967 तक हुए दल - बदल में कांग्रेस को अधिक लाभ हुआ । इस अवधि में होने वाले दल - बदल में कांग्रेस से जाने वाले सदस्यों की संख्या 98 थी जबकि कांग्रेस में आने वालों की संख्या 419 थी । 1967-68 के वर्ष में कांग्रेस को हानि हुई । इस अवधि में कांग्रेस से जाने वाले सदस्यों की संख्या 175 थी और कांग्रेस में आने वालों की संख्या 139 थी । इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि 1967 तक दल - बदल एकतरफा थी , उसके बाद दोतरफा हो गयी ।


1977 के पश्चात् दल - बदल ने एक नया रूप धारण किया ।

1977 के पश्चात् दल - बदल ने एक नया रूप धारण किया । अब तक जितने भी दल - बदल हुए थे वे सभी किसी एक या कुछ विधायकों द्वारा किये गये थे परन्तु 1977 और 1980 में समस्त सरकार द्वारा दल - परिवर्तन की दो घटनाएं हुई । 1977 में केन्द्र में जनता पार्टी के शासन काल में सिक्किम में कांग्रेस दल सत्तारूढ़ था लेकिन केन्द्र में जनता पार्टी के सत्ता में आते ही सिक्किम सरकार ने अपनी निष्ठा " जनता पार्टी ' के पक्ष में बदल कर जनता पार्टी सरकार होने की घोषणा कर दी । 1980 में जब फिर से केन्द्र में कांग्रेस ( इ ) की सरकार बनी तो सिक्किम सरकार ने जनता पार्टी से सम्बन्ध तोड़कर कांग्रेस दल के प्रति अपनी निष्ठा बदल ली । इस प्रकार जनता पार्टी सरकार पुनः कांग्रेस सरकार में बदल गयी । दोनों बार निष्ठा बदलने पर भी मुख्यमंत्री लेंडुप दोरजी ही रहे ।


इसी प्रकार 22 जनवरी , 1980 को हरियाणा की जनता पार्टी सरकार ने अपनी निष्ठा बदल ली । मुख्यमंत्री भजन लाल अपने 37 साथियों सहित कांग्रेस पार्टी से जा मिले और भजन लाल के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार कांग्रेस पार्टी की सरकार बन गयी । जुलाई , 1979 में जनता पार्टी में दल - बदल के कारण केन्द्र में मोरारजी देसाई को त्यागपत्र देना पड़ा । उसके पश्चात् अन्य दलों के सहयोग से चरण सिंह ने अपनी सरकार बनायी परन्तु वह संसद में विश्वास प्राप्त नहीं कर सकी । दल - बदल के कारण केरल की करुणाकरन सरकार को 1982 में पद त्याग करना पड़ा । यह दल - बदल का खेल वर्तमान में भी जारी है । दल - बदल विरोधी कानून पास होने के बाद भी कानून की कमियों के रहते यह अपना प्रभाव दिखा रहा है । अगस्त 2003 के अन्तिम सप्ताह में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के त्याग - पत्र देने के कारण बसपा की सरकार गिर गयी और अन्य दलों के सहयोग से मुलायम सिंह ने अपनी सरकार बनायी । बसपा के 37 विधायकों ने भी बसपा से दल - बदल कर नयी पार्टी गठन कर ली और मुलायम सिंह को समर्थन दिया ।



दल - बदल के कारण ( Causes of Defection )

भारत में राजनीतिक दल - बदल के निम्नलिखित कारण हैं


1. 1967 के आम चुनावों में विरोधी दलों की सफलता , 1967 ( Success of the Opposition parties in the election of 1967 ) - 1967 के आम चुनावों उत्तर प्रदेश , बिहार , तमिलनाडु , केरल , पश्चिमी बंगाल , पंजाब , उड़ीसा और राजस्थान में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला और केन्द्र में भी कांग्रेस का बहुमत कम हो गया । 1967 के चुनावों के बाद हरियाणा में दल - बदल के कारण राव वीरेन्द्र सिंह की सरकार बनी । पंजाब में सरदार गुरनाम सिंह के नेतृत्व में अकाली दल और जनसंघ ने मिलकर सरकार बनायी । तमिलनाडु में डॉ . एम . के की सरकार बनी उत्तर प्रदेश में चौ . चरण सिंह ने जनसंघ , संयुक्त समाजवादी दल तथा भारतीय क्रान्ति दल की सहायता से सरकार बना ली पश्चिमी बंगाल में संयुक्त विधायक दल की सरकार अजय मुखर्जी के नेतृत्व में बनी । 1967 के बाद जनता ने यह अनुभव किया कि कांग्रेस के एकछत्र राज्य को भी तोड़ा जा सकता है ।


2. राज्यों में स्थिर सरकारों का न होना ( No Stable Governments in the States ) -राज्यों में स्थिर सरकारों के न होने से भी दल - बदल को बढ़ावा मिला । 1967 के आम चुनावों में स्थिति यह थी कि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और कुछ विधायकों के कांग्रेस दल या विपक्ष , जिसमें भी मिल जायें उसी की सरकार बन सकती थी । बिहार , पंजाब , मध्य प्रदेश , पश्चिमी बंगाल , कर्नाटक और गुजरात में इसी दल - बदल के कारण सरकारें बनीं । वर्तमान में भी यह खेल जारी है । उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार अगस्त 2003 के अन्त में गिर गयी जो भाजपा के सहयोग से बनी थी और भाजपा के समर्थन वापस लेते ही सरकार अल्पमत में आ गयी । सितम्बर 2003 के शुरू में मुलायम सिंह की सरकार कई दलों के समर्थन से बनी जिसमें बसपा के भी 37 विधायक सम्मिलित थे ।


3. मन्त्रिपद और धन का प्रलोभन ( Temptation of Ministry and Money ) – किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने से यह स्थिति हो गयी है कि प्रत्येक दल अपनी सरकार बनाने के लिए होड़ लगाये रहता है । ऐसे में विधायकों को खरीदने का काम वोट खरीदने जैसा हो जाता है । विधायकों के मन में यह लालसा उत्पन्न हो गयी है कि सत्तारूढ़ दल में सम्मिलित होकर मन्त्रिपद अथवा धन जो भी मिले प्राप्त किया जाये । यह कारण आज भी प्रभावी है । उत्तर प्रदेश में अक्टूबर 2003 में मुलायम सिंह का 98 सदस्यीय मन्त्रिमण्डल इसका प्रमाण है ।


4. राजनीतिक दलों के पास महान व्यक्तित्व के नेता की कमी ( Lack of Leader of Great Personality with the Political Parties ) — राजनीतिक दलों के पास जब महान् व्यक्तित्व वाले ऐसे नेता का अभाव होता है , जिसका प्रभाव सारे देश में व्याप्त हो तो भी दल - बदल को बढ़ावा मिलता है । 1967 के आम चुनाव में कांग्रेस और विपक्ष के पास कोई ऐसा प्रभावशाली नेता नहीं था । कांग्रेस की नेता श्रीमती इन्दिरा गांधी 1967 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार के कारण प्रसिद्ध नहीं हो सकी थीं और चौ . चरण सिंह दल - बदलू थे । वे कभी कांग्रेस से तो कभी जनसंघ , स्वतन्त्र पार्टी और संयुक्त समाजवादी पार्टी से गठबन्धन करते - फिरते थे । हरियाणा में राव वीरेन्द्र सिंह , बिहार में महामाया प्रसाद और पश्चिमी बंगाल में अजय मुखर्जी सुदृढ़ स्थिति में नहीं थे । यह कारण वर्तमान में भी प्रभावी है । मायावती अपने को अनुसूचित जाति को नेता मानती हैं तो मुलायम सिंह पिछड़ी जाति का केन्द्र में अटल बिहारी बाजपेयी या सोनिया गाँधी भी इतने प्रभावशाली व्यक्तित्व के नेता नहीं बन सके हैं कि जो अपने बल पर अपनी पार्टी को संसद में स्पष्ट बहुमत दिला सकें । तेरहवीं लोक सभा में नवम्बर 2002 में बाजपेयी सरकार 22 दलों को मिलाकर बनीं ।


5. राजनीतिक दलों के नेताओं की निजी महत्वाकांक्षाएँ ( Personal Ambitions of the Leaders of Political Parties ) — किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में अनेक विधायक मंत्री अथवा मुख्यमंत्री बनने की महत्त्वाकांक्षा पाल लेते हैं और इसे पूरा करने के लिए दल - बदल का खेल जारी रहता है । 1967 के चुनावों के बाद भी आया राम - गया राम जारी था और वर्तमान में भी जारी है । सितम्बर 2003 में मुख्यमंत्री बनने के बाद मुलायम सिंह ने अपने मन्त्रिमण्डल का विस्तार 98 मन्त्रियों तक पहुंचा दिया जो देश में एक रिकार्ड है । यदि 2 मन्त्रियों को और सम्मिलित कर लेते तो देश में पहला शतकीय मन्त्रिमण्डल बनाने का रिकार्ड बन जाता । यह नेताओं की महत्वाकांक्षा का ही प्रतीक है ।



6. विचारात्मक ध्रुवीकरण का अभाव ( Lack of Ideological Polarisation ) भारत में विचारात्मक ध्रुवीकरण के अभाव के कारण दल - बदल को प्रोत्साहन मिलता है । उदाहरण के लिए , 1967 के चुनावों के पश्चात् विपक्ष की पार्टियों ने मिलकर संयुक्त सरकारें तो बना लीं लेकिन उनमें आर्थिक , सामाजिक और राजनीतिक कार्यक्रमों को लागू करने के बारे में इनता मतभेद रहा कि वे आपस में मिलकर बहुत समय तक कार्य नहीं कर सके और शीघ्र ही उनका पतन हो गया । वर्तमान में न्यूनतम साक्षा कार्यक्रम बनाकर सरकारें बनायी जाती हैं परन्तु फिर भी विचारात्मक ध्रुवीकरण के अभाव के कारण वे गिर जाती हैं । उदाहरण के लिए , उत्तर प्रदेश में मायावती ( बसपा ) और कल्याण सिंह ( भाजपा ) की संयुक्त सरकार का गिरना , जिसमें 6-6 माह के लिए बारी - बारी से मुख्यमंत्री बनना था । मायावती अपना 6 माह का कार्यकाल पूरा कर गयीं लेकिन कल्याण सिंह का अवसर आते ही मायावती ने गठबन्धन तोड़ दिया ।


7. दल - बदल के प्रति जनता की उदासीनता ( Neutrality of the Public towards Defections ) दल - बदल का एक प्रमुख कारण जनता का दल - बदल के प्रति उदासीन रहना था । जनता ने दल - बदलुओं के साथ सहानुभूति दिखायी और निर्वाचनों में उन्हें सफल बनाया । उदारहण के लिए , उत्तर प्रदेश में चौ . चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रान्ति दल ( BKD ) को 1969 के मध्यावधि चुनावों में बहुत सफलता मिली । इसी प्रकार बिहार में दल - बदलुओं के महत्त्वपूर्ण सदस्यों को मध्यावधि चुनावों में सफलता मिली । इसका परिणाम यह रहा कि विभिन्न दलों के नेताओं ने यह मान लिया कि दल बदल जनता की निगाह में कोई गलत चीज नहीं है ।


दल - बदल के कुछ विवादास्पद मामले ( Some Controversial Cases of Defection )


भारत में दल - बदल को रोकने के उद्देश्य से 15 फरवरी , 1985 को संविधान में 52 वें संविधान संशोधन को अनुसूची 10 में सम्मिलित किया गया । परन्तु दल - बदल के कानून के लागू होते ही इसका दुरुपयोग आरम्भ हो गया । दल - बदल के द्वारा नागालैण्ड , मणिपुर , गोवा , मेघालय , मिजोरम तथा कुछ अन्य राज्यों की सरकारें गिरा दी गयीं । विभिन्न पीठासीन अधिकारियों द्वारा संविधान की 10 वीं अनुसूची में प्रयुक्त शब्दों की भिन्न - भिन्न तरह से व्याख्या की गयी और परस्पर विरोधी निर्णय दिये गये । अनेक सदस्यों को न्यायालय जाना पड़ा । कुछ मामलों में तो पीठासीन अधिकारियों के फैसले से न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गयी । इस तरह के कुछ विवाद निम्नलिखित हैं


जुलाई 1990 में मणिपुर में कांग्रेस ( आई ) दल के 14 सदस्यों ने अलग होकर मणिपुर कांग्रेस नाम से नयी पार्टी का गठन किया । उन्होंने अध्यक्ष से इसकी मान्यता माँगी । इसी बीच 14 में से 7 सदस्यों को निलम्बित कर दिया गया । अध्यक्ष डॉ . एच . बारोबाबू ने कहा कि बाकी 7 सदस्य नयो पार्टी नहीं बना सकते क्योंकि सदन में कांग्रेस की कुल सदस्य संख्या 26 का एक - तिहाई नहीं है । अध्यक्ष द्वारा दल - बदल कानून के अन्तर्गत उनकी सदस्यता समाप्त कर दी गयी ।


विवाद सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा । सर्वोच्च न्यायालय ने मणिपुर विधान सभा अध्यक्ष द्वारा सात विधायकों को दल - बदल कानून के अन्तर्गत अयोग्य घोषित करने के आदेश को निरस्त कर दिया और आदेश दिया कि उनके वेतन का भुगतान कर दिया जाये । मणिपुर विधान सभा सचिव श्री मनी लाल सिंह ने उनके वेतन का भुगतान कर दिया । उससे क्रोधित होकर अध्यक्ष ने सचिव को नौकरी से हटा दिया । सर्वोच्च न्यायालय ने इसको असंवैधानिक ठहराया और सचिव को नौकरी पर बहाल करने तथा वेतन देने का निर्देश दिया । सर्वोच्च न्यायालय ने अध्यक्ष को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दिया । अध्यक्ष ने कहा कि वह अध्यक्ष के रूप में न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने को बाध्य नहीं हैं । न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 10 वीं अनुसूची के अधीन जब अध्यक्ष अपनी शक्ति का प्रयोग करता है तो वह न्यायालय की अधिकारिता के अधीन रहता है । यह उसका प्रशासनिक कार्य है जो विधान सभा के अध्यक्ष के कार्यों से पृथक् है । न्यायालय के कई आदेशों के बाद भी न उपस्थित होने पर न्यायालय ने बल प्रयोग करके उन्हें उपस्थित होने का निर्देश दिया । अंत में 24 मार्च , 1993 को अध्यक्ष न्यायालय में उपस्थित हुए और शपथ पत्र दाखिल किया कि उन्होंने न्यायालय के सभी आदेशों का पालन किया है और करने को तैयार हैं और उक्त घटना के लिए खेद प्रकट किया । इस पर न्यायालय ने उनके विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही समाप्त कर दी । मिजोरम के राज्य बनाने के बाद लालडेंगा के नेतृत्व में सरकार बनी । इसके बाद सत्ता पक्ष के नौ सदस्य पार्टी से अलग हो गये । सरकार गिर गयी । इधर अध्यक्ष को ज्ञात हुआ कि एक सदस्य विदेश में था जिसके कारण कुल संख्या एक - तिहाई से कम हो रही थी । अध्यक्ष ने दल - बदल कानून के अन्तर्गत आठ सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर दी । विवाद सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा ।


नागालैण्ड में एक अन्य घटना घटित हुई । मुख्यमंत्री एस . सी . जमीर के दल के बारह सदस्य एक - तिहाई समूह में बाहर आ गये । इस समूह ने दूसरे समूहों के साथ मिलकर संयुक्त विधायक दल बनाने का निर्णय लिया । श्री के . एल . चिश्ती को नेता माना गया । इसी बीच कांग्रेस महासचिव के द्वारा दो सदस्यों को निलम्बित कर दिया गया । बाकी संख्या एक तिहाई से कम हो गयी एवं अध्यक्ष ने दल - बदल कानून के अन्तर्गत इनकी सदस्यता समाप्त करने की घोषणा की । राज्यपाल ने अध्यक्ष को पुनर्विचार के लिए कहा एवं इन्कार करने पर एस . जी . जमीर सरकार बर्खास्त करके के . एल . चिश्ती को सरकार बनाने का आमंत्रण दे डाला ।


दल - बदल निरोधक कानून के बनने के बाद केन्द्र में भी दल - बदल की घटनाएँ घटित हुई । नवीं लोक सभा के काल में पी . पी . सिंह और चन्द्रशेखर को सरकार जल्दी - जल्दी गिर गयीं । 5 नवम्बर , 1990 को जनता दल में विभाज हुआ तो दल से टूटने वाले 58 सदस्यों में से 25 सदस्यों को तुरन्त दल से निकाल दिये जाने की घोषणा कर दी गयी । अध्यक्ष ने उन्हें असम्बद्ध भी घोषित कर दिया । कहा गया कि बचे हुए 33 सदस्य जनता दल की कुल सदस्य संख्या के एक तिहाई से कम हैं अत : इसे दल का विभाजन नहीं माना जा सकता । चन्द्रशेखर ने अपने दल की सरकार बना ली और सदन में बहुमत प्राप्त कर लिया । उनके दल के सभी सदस्य वे थे जिन्हें या तो जनताल से निष्कासित और असम्बद्ध करार दे दिया गया था था वे जिन्हें दल - बदल निरोधक कानून के अन्तर्गत यह नोटिस जारी किया जा चुका था कि उनकी सदस्यता क्यों न समाप्त कर दो जाये । अध्यक्ष रविराय द्वारा जारी नोटिसों की लपेट में चन्द्रशेखर सरकार के लगभग सभी मंत्री आ जाते थे । किन्तु अन्त में अध्यक्ष ने अपने निर्णय द्वारा सत्ताधारी दल को सन्देह का लाभ देते हुए विभाजन को स्वीकृति दे दी ।


अध्यक्ष रविराय ने 11 जनवरी , 1991 को निर्णय देते हुए कहा कि इस तरह का कोई प्रमाण नहीं मिला कि जनता दल में विभाजन 25 सदस्यों के निष्कासन से पहले हुआ क्योंकि इस बारे में कई दावे - प्रतिदावे है लेकिन निष्कासन और अलग हुए घटक की बैठक दोनों को चुनौती दी गयी है । इसलिए उन्होंने निर्णय किया कि संदेह का लाभ इस श्रेणी के सदस्यों को दिया जाये । उन्होंने कहा कि यदि वह निष्कासन से पहले विभाजन को स्वीकार नहीं करते हैं तो ये सभी सदस्य अयोग्य हो जायेंगे । संदेह का लाभ इन 28 सदस्यों को देते हुए इनके विरुद्ध दायर याचिका रद्द की अध्यक्ष ने जनता दल ( स ) को सदन में एक अलग दल के रूप में मान्यता देते हुए उसके 54 सदस्यों के नामों की भी घोषणा की । उनका यह भी कहना था कि विभाजन एक समय पर होने वाली घटना है , कुछ दिनी की क्रिया नहीं । पार्टी में विभाजन के को हुआ । अतः 5 नवम्बर के बाद आने वाले सदस्यों , जिनमें 5 मंत्री थे , को उनकी सदस्यता से वंचित कर


दल - बदल कानून के संदर्भ में अजीत सिंह का दल - बदल का मामला भी उल्लेखनीय है । जनता दल ने अजीत सिंह को दिसम्बर 1991 में और अन्य तीन सदस्यी - सत्यपाल सिंह यादव , रा सिंह पंवार तथा रशीद मसूद को फरवरी 1992 में दल से निकाल दिया । इसके बाद राजनाथ सोनकर शास्त्री राम निहोर राय एवं अन्य दो सदस्यों को जुलाई 1902 में पार्टी में अनुशासन के नाम पर निकाल दिया गया । अजीत सिंह एवं 19 अन्य सदस्यों ने जनता दल से अलग बैठने के लिए सीट आवंटित करने की मांग की । इन सदस्यों ने दावा किया कि वे एक समूह है तथा उनकी सदस्य संख्या एक तिहाई से अधिक है । अतएव दल - बदल कानून के अन्तर्गत मान्यता दी जाये ।


7 अगस्त , 1992 को अध्यक्ष शिवराज पाटिल ने अजीत सिंह व अन्य 19 सदस्यों को दल के सदस्यों से अलग बैठने की सीट देने सम्बन्धी अंतरिम फैसला दिया । अध्यक्ष के अन्तरिम कैसले का विपक्षी सदस्यी ने कड़ा विरोध किया । जनता दल अध्यक्ष एस . आर . बोम्पई का तर्क था कि इन बीस सदस्यों का एक समूह नहीं हो सकता क्योंकि इनमें से आठ को पहले से ही निलम्बित किया जा चुका है तथा अविश्वास प्रस्ताव के समय पार्टी डिप की ही अवजा के कारण अन्य चार सदस्य दल - बदल कानून के अन्तर्गत अयोग्य घोषित किये है जा सकते हैं । दोनों पक्षों की दलीलें एवं विभिन्न पर्थों की राय लेने के बाद अध्यक्ष पाटिल ने एक जून 1993 को निर्णय देते हुए कहा कि सदन के भीतर किसी सदस्य की सांविधानिक हैसियत को राजनीतिक दल से उसके निष्कासन द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता है । उन्होंने जनता दल के 4 लोक सभा सदस्यों ( राम सुन्दर दास , गोविन्द चन्द्र मुण्डा , गुलाम मोहम्मद खान , राम बदन ) को लोक सभा की सदस्यता से अयोग्य करार दिया । उन्हें 17 जुलाई , 1992 को पार्टी दिए का उल्लंघन करने का दोषी पाया गया । उन्होंने जनता दल ( अ ) के शेष 16 सदस्यों को एक अलग गुट के रूप में मान्यता दे दी । अध्यक्ष के फैसले से जनता दल का संसद में 1 जून , 1993 को औपचारिक विभाजन हो गया तथा जनता दल ( अ ) की सदस्यों की संख्या घटकर 16 हो गयी ।


2 जुलाई , 1993 को जनता दल ( अ ) के 4 लोक सभा सदस्यों को दल - बदल कानून के अन्तर्गत सदन की सदस्यता से अयोग्य घोषित करने के निर्णय के क्रियान्वयन पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी । 2. अगस्त , 1993 को जनता दल ( अ ) से अलग हुए 7 सांसद कांग्रेस में बिना शर्त शामिल हो गये । इन सांसदों ने पार्टी विहिप का उल्लंघन करते हुए विरोध में मतदान किया था । विपश्च में जनता दल ( अ ) के हुए सांसदों को कांग्रेस में शामिल किये जाने की निन्दा की व आरोप लगाया कि दल - बदल कानून की खामियों के कारण अब व्यक्तिगत के बदले सामूहिक दल - बदल होने लगा है ।


1997 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनाने और बचाने में दल - परिवर्तन ने एक प्रभावी साधन की भूमिका अदा की । अक्टूबर 1996 में उत्तर प्रदेश विधान सभा के मध्यावधि चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं प्राप्त हुआ परिणामस्वरूप भारतीय जनता पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी में समझौता हुआ और समझौते के तहत उनकी साझा सरकार बनी । उक्त दोनों दलों ने इस आधार पर सरकार बनायी कि प्रथम 6 . महीने बसपा का मुख्यमंत्री होगा और 6 महीने भाजपा का मुख्यमंत्री 21 मार्च , 1997 को मायावती के नेतृत्व में भाजपा एवं बसपा की सम्मिलित सरकार बनी मायावती के मुख्यमंत्रित्व में सरकार ने 6 महीने पूरे किये और उसके बाद कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री का पद संभाला कल्याण सिंह के पदारूढ़ होते ही भाजपा एवं बसपा में मतभेद शुरू हो गया इसमें मुख्य मुद्दा हरिजन एक्ट का था । मतभेद यहाँ तक बढ़ गये कि मायावती ने सरकार से अलग होने एवं समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी । तत्पश्चात् बहुमत सिद्ध करने के लिए राज्यपाल ने कल्याण सिंह को निर्देश दिया । 21 अक्टूबर , 1997 को विधान सभा का सत्र आहूत किया गया । बसया में विभाजन के खतरे को दृष्टि में रखते हुए मायावती ने 20 अक्टूबर , 1997 को बसपा विधायकों के लिए विहिप जारी किया ।


21 अक्टूबर , 1997 को विधान सभा में बसपा का सीधा ( बर्टिकल ) विभाजन हो गया एवं कुल सदस्यों के एक - तिहाई सदस्यों ने मारकण्डेय के नेतृत्व में एक अलग दल बना लिया । ऐसा दावा मारकण्डेय चन्द ने प्रस्तुत किया सदन में विश्वास प्रस्ताव पर मतदान के दौरान बसपा के इन विधायकों ने मारकण्डेय चन्द के नेतृत्व में कल्याण सिंह सरकार के पक्ष में मतदान किया तथा जनतांत्रिक बहुजन समाज पार्टी के नाम से नये दल का गठन कर लिया । प्रक्रियास्वरूप बसपा विधानमण्डल दल की नेता मायावती एवं बसपा विधायक आर . के . चौधरी ने अलग - अलग 12 याचिकाएँ प्रस्तुत की और विधान सभा अध्यक्ष से अनुरोध किया कि वंश नरायण सिंह , मारकण्डेय चन्द , यशवंत सिंह , चौधरी नरेन्द्र सिंह , शिवेन्द्र सिंह , सरदार सिंह , प्रेम प्रकाश सिंह , सुखपाल पाण्डेय , राधेश्याम पाण्डेय , राजा गजनफर अली , भगवान सिंह शाक्य , डॉ . राम आसरे सिंह कुशवाह आदि की विधान सभा की सदस्यता समाप्त की जाये क्योंकि इन लोगों ने भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में उल्लिखित दल - बदल कानून का उल्लंघन किया । उक्त विधायकों ने पार्टी ह्विप का पालन नहीं किया एवं • उनकी संख्या भी बसपा की कुल विधायकों की एक तिहाई से कम है । दल - बदल में आरोपित विधान सभा सदस्यों ने अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि बसपा विधानमण्डल दल की नेता मायावती ने 21 अक्टूबर , 1997 को सदन में आने से पूर्व बसपा के सदस्यों को निर्देशित किया कि वे विधान सभा की कार्रवाई नहीं चलने दें तथा सदन की बैठक में मारपीट एवं हंगामा करके विधान सभा अध्यक्ष को विश्वास मत का प्रस्ताव सदन में न पेश करने दें । अतएव विधान मण्डल दल की नेता मायावती द्वारा 20 अक्टूबर , 1997 को जारी किया गया ह्विप स्वतः समाप्त हो गया क्योंकि 21 अक्टूबर , 1997 को उन्होंने सदन में आने से पूर्व उनके द्वारा दिया गया उक्त निर्देश एवं उनके ह्विप का खण्डन कर देता है ।


बसपा द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में रिट दायर की गयी । माननीय न्यायालय ने उक्त मामले में कोई निर्णय न देकर विधान सभा के अध्यक्ष को निर्देश दिया कि वह शीघ्र मामले का निस्तारण करें । विधान सभा अध्यक्ष ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद 23 मार्च , 1998 को मायावती एवं आर . के . चौधरी द्वारा दायर सभी याचिकाओं को निस्तारित करते हुए निर्णय किया कि 20 अक्टूबर , 1997 का तथाकथित ह्विप संविधान की दसवीं अनुसूची की धारा 2 ( 1 ) ( ख ) के तहत को विधिक ह्विप नहीं है और यह याचिकाएँ उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य ( दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हत ) नियमावली 1987 के नियम -7 के उपनियम ( 4 ) ( 5 ) की शर्तों को पूरा नहीं करती है ।



अतः दल - बदल में आरोपित सभी सदस्य भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची की धारा 2 ( 1 ) के तहत इसके दोषी नहीं हैं और उनकी विधान सभा की सदस्यता समाप्त नहीं की जा सकती है । उन पर लगाये गये आरोप निराधार एवं औचित्यहीन हैं । आरोपित सभी सदस्य विधान सभा में जनतान्त्रिक बहुजन समाज पार्टी के सदस्य के रूप में जाने जायेंगे ।


दल - बदल के परिणाम ( Results of Defection )

भारतीय राजनीति में दल - बदल के कुछ परिणाम इस प्रकार देखे जा सकते हैं

( i ) दल - बदल के कारण कांग्रेस पार्टी का राजनीतिक एकाधिकार जो 1952 से चला आ रहा था , 1967 में आकर समाप्त हो गया और कांग्रेस के असन्तुष्टों ने दलों से मिलकर सरकारें बनाने का प्रयास किया ।

( ii ) दल - बदल से देश में प्रशासनिक सुधार बाधित हुआ और देश की प्रगति रुक गयी क्योंकि विधायकों को चिन्ता देश की प्रगति की न होकर अपने मन्त्रिपद या धन की सताने लगी ।

( iii ) दल - बदल से संयुक्त सरकारें बनने लगी जिससे उनमें विचारों में एकता नहीं रह सकी और सरकारें बार - बार गिरती और बनती रहीं ।

( iv ) नौकरशाही ने दल - बदल के कारण अपने प्रभाव में वृद्धि की क्योंकि सरकारें शीघ्र और स्पष्ट निर्णय लेने से डरने लगीं ।

( v ) दल - बदल के कारण अनेक सदस्यों को मन्त्रिमण्डल में सम्मिलित करना मुख्यमंत्री की विवशता हो गयी क्योंकि मन्त्रिपद न मिलने से विधायकों का दल - बदल करना सम्भव था । यही कारण है कि ने कल्याण सिंह ने 1997 में 93 सदस्यीय तथा मुलायम सिंह ने अक्टूबर 2003 में 98 सदस्यीय मन्त्रिमण्डल बनाये ।

( vi ) राजनीतिक दलों में बिखराव शुरू हो गया ।

( vii ) दल - बदल के कारण पदलोलुपता और अवसरवादिता बढ़ गयी जिससे राजनीति सिद्धान्तहीन हो गयी ।


दल - बदल रोकने के प्रयास ( Efforts to Control the Defection ) दल - बदल के कारण देश में अनेक राज्यों की सरकारें आये दिन गिरने और बनने लगीं जिससे राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो गयी । दल - बदल को मतदाताओं के साथ भारी विश्वासघात कहा गया । इसे संसदीय जनतन्त्र के लिए घातक मानते हुए इसे रोकने के लिए माँग उठने लगी । इस दल - बदल को रोकने के लिए 11 अगस्त , 1968 को कांग्रेसी संसद सदस्य बैंकट सुब्बैया ने एक गैर - सरकारी प्रस्ताव ( Non - government Bill ) लोक सभा में रखा । इसे लोक सभा ने 8 दिसम्बर , 1968 में पारित कर दिया । फरवरी , 1969 को लोक सभा ने एक समिति की नियुक्ति की , जिसके अध्यक्ष तत्कालीन गृहमन्त्री श्री यशवन्त राव बलवन्त राव चह्वाण को बनाया गया । इस समिति में 28 अन्य सदस्य भी थे । इस समिति ने 18 फरवरी , 1969 को अपनी रिपोर्ट सदन में दी , जिसमें निम्नलिखित सुझाव थे 1

( i ) सभी राजनीतिक दल मिलकर एक ऐसी आचार संहिता तैयार करें , जो सबको मान्य हो । यदि एक विधायक या संसद सदस्य एक दल को बदलकर दूसरे दल में मिलना चाहें , तो दूसरा दल उसे अपनी सदस्यता उस समय तक न दे जब तक कि वह सदन की सदस्यता से त्यागपत्र देकर दोबारा उस दल के टिकट पर चुनाव न लड़े ।


( ii ) प्रत्येक दल केवल ऐसे उम्मीदवारों को ही टिकट दें जो कि उस दल में गहरी निष्ठा रखते हों । 1


( iii ) दल - बदलुओं को निश्चित अवधि के लिए चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाये ।

( iv ) दल - बदलुओं को अपने दल से त्यागपत्र देकर दूसरे दल के कार्यक्रम और नीतियों के अनुसार चुनाव लड़ना चाहिए ।

( v ) मन्त्रि परिषदों के आकार को सीमित किया जाये जिससे दल - बदलुओं को मन्त्रिपद का लालच न रहे । ( vi ) चह्वाण समिति ने यह सिफारिश की कि मन्त्रियों की अवधि अधिक से अधिक 10 वर्ष निर्धारित कर दी जाये ताकि नये व्यक्तियों को मन्त्री बनने का अवसर मिले ।

( vii ) दलीय अनुशासन कठोर किया जाये और कोई भी दल दूसरे दल के किसी भी असन्तुष्ट गुट को अपने में शरण न दें ।


( viii ) जनता दल - बदलुओं को चुनाव में पराजित कर दे ।

( ix ) प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री लोकप्रिय सदन से ही लिये जायें ।

( x ) अधिक दल - बदल होने की स्थिति में मुख्यमंत्री को विधान सभा के भंग करवाने का अधिकार होना चाहिए

( xi )दल - बदलने वाले सदस्यों को दल - बदलने की तिथि से एक साल के लिए किसी भी पद उदाहरणार्थ- मन्त्रिपद , अध्यक्ष अथवा उपाध्यक्ष पदों पर नियुक्त होने से वंचित कर दिया जाना चाहिए ।


चह्वाण समिति के सुझावों पर सदस्यों में तीव्र मतभेद हो गया । कांग्रेस ( संगठन ) ने कहा कि दल - बदल रोकने का एकमात्र उपाय यह है कि ऐसे सदस्य के लिए विधानमण्डल की सदस्यता से त्यागपत्र देकर पुनः चुनाव लड़ना आवश्यक ठहरा दिया जाये । प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने कहा कि मतदाताओं से विधायकों को वापस बुलाने का अधिकार दिया जाये । कुछ दलों ने यह कहा कि चह्वाण समिति की यह सन्तुति कि दल - बदल करके आये हुए सदस्यों को एक वर्ष तक मन्त्रिपद न दिया जाये , व्यावहारिक रूप से अधिक लाभदायक नहीं होगी क्योंकि ऐसे सदस्यों को नकद पैसा अथवा किसी अन्य ढंग से आर्थिक लाभ पहुँचाकर अपने साथ लाया जा सकता है ।


चह्नाण समिति की रिपोर्ट के अनुसार जब एक विधेयक तैयार करके विधि मन्त्रालय के पास भेजा गया तो उसने इसमें अनेक अग्रलिखित वैधानिक कठिनाइयाँ प्रस्तुत की


( i ) प्रस्तावित विधेयक भारतीय संविधान के अनु . 19 ( 1 ) ( C ) से टकराता है जिसमें मौलिक अधिकारों का वर्णन है और लोगों को संस्थाएँ बनाने का अधिकार है ।


( ii ) यह विधेयक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 102 से टकराता है जिसमें संसद के सदस्यों की अर्हताओं ( Qualifications ) का वर्णन है ।


( iii ) यह विधेयक भारतीय संविधान के अनु . 191 के विरुद्ध है जिसमें विधान सभा अथवा विधान परिषद् की सदस्यता के लिए अर्हताएँ दी हुई हैं । 16 मई , 1973 को 32 वाँ संशोधन विधेयक गृहमन्त्री उमाशंकर दीक्षित ने दल - बदल रोकने के लिए लोक सभा में रखा , जिसमें निम्नलिखित प्रावधान थे


( i ) संविधान के अनु . 75 में संशोधन करके यह व्यवस्था की गयी थी कि प्रधानमंत्री निम्न सदन से चुना जायेगा ।

( ii ) अनु . 102 में संशोधन करके यह व्यवस्था करने का प्रावधान था कि यदि कोई विधायक अपनी इच्छा से उस राजनीतिक दल , जिसके उम्मीदवार के रूप में वह निर्वाचित हुआ था अथवा जिस राजनीतिक दल में वह स्वतन्त्र प्रत्याशी के रूप में निर्वाचित होने के बाद सम्मिलित था , छोड़ता है तो उसकी संसद या विधान मण्डल की सदस्यता का अन्त हो जायेगा ।

( iii ) यदि कोई सदस्य विधानमण्डल में होने वाले मतदान में बिना अपने दल की अनुमति के अनुपस्थित रहता है अथवा दल के हिप के खिलाफ मतदान करता है तो यह भी दल परिवर्तन समझा जायेगा और उस सदस्य की सदस्यता का अन्त हो जायेगा ।

( iv ) यदि विधानमण्डल का कोई सदस्य अपनी पार्टी में विभाजन होने के कारण अपने उद्गम संगठन से सम्बन्ध विच्छेद करता है तो उसे दल परिवर्तन न समझा जायेगा ।


उपर्युक्त विधेयक 13 दिसम्बर , 1973 को 60 सदस्यों की एक संयुक्त प्रवर समिति को सौंप दिया । समिति ने 3 वर्ष से भी अधिक समय व्यतीत होने के बाद भी अपनी रिपोर्ट नहीं दी और 1977 में लोक सभा का विघटन हो गया । इसलिए इस विधेयक का भी अन्त हो गया । 26 सितम्बर , 1969 को जम्मू - कश्मीर विधान सभा ने एक ' दल - बदल रोक कानून ' पारित किया जिसमें निम्नलिखित प्रावधान हैं

( अ ) कोई भी विधायक यदि दल से त्यागपत्र देता है तो उसकी विधान सभा की सदस्यता भी समाप्त हो जायेगी । ( ब ) यदि कोई विधायक अपनी पार्टी से ह्विप के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान में भाग नहीं लेता तो भी उसकी सदस्यता समाप्त हो जायेगी ।


इस कानून को जम्मू - कश्मीर के उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी , उच्च न्यायालय ने इस कानून को वैध घोषित कर दिया । 1977 में जनता पार्टी के सत्ता में आने के पश्चात् एक बार पुनः दल - बदल रोकने का प्रयास किया गया । 28 अगस्त , 1978 को लोक सभा में जनता पार्टी सरकार द्वारा इस आशय का एक विधेयक प्रस्तुत किया गया जिसे बाद में वापस ले लिया गया , क्योंकि जनता पार्टी के कुछ सदस्यों ने ही उसका विरोध किया । आठवीं लोकसभा के प्रथम अधिवेशन में 17 जनवरी , 1985 को राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में कहा कि सरकार दल - बदल रोकने के लिए एक विधेयक प्रस्तुत करेगी । 24 जनवरी , 1985 को संविधान के 52 वें संशोधन के रूप में विधि मन्त्री ने इस आशय का विधेयक प्रस्तुत किया । 30 जनवरी , 1985 को एक ही दिन में यह विधेयक सभी चरणों से गुजर कर लोकसभा द्वारा पारित कर दिया गया और अगले दिन राज्य सभा ने भी इसे पारित कर दिया । 15 फरवरी , 1985 को राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति मिल जाने के पश्चात् यह विधेयक संविधान का 52 वां संशोधन अधिनियम बन गया । इस अधिनियम द्वारा संविधान में अनुसूची 10 जोड़ी गयी । इस संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गयी है कि संसद अथवा राज्य विधान मण्डल के सदस्य की सदस्यता निम्न परिस्थितियों में समाप्त हो जायेगी

( i ) यदि कोई सदस्य उस दल से , जिसके टिकट पर निर्वाचित हुआ था , स्वेच्छा से त्यागपत्र दे देता है ।


( ii ) यदि कोई सदस्य सदन में पार्टी के द्विप के विरुद्ध मतदान करता है अथवा अपने दल की पूर्व अनुमति के बिना मतदान के समय सदन में अनुपस्थित रहता है । परन्तु ऐसे सदस्य की सदस्यता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा । यदि सदन में अनुपस्थित रहने या हिप के विरुद्ध वोट देने के 15 दिन के अन्दर सम्बन्धित दल उस सदस्य के उपरोक्त आचरण के लिए क्षमा कर दे ।


( iii ) यदि कोई निर्दलीय सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले ।


( iv ) यदि कोई मनोनीत सदस्य , सदस्यता की शपथ लेने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर लेता है तो उसकी सदस्यता का अन्त हो जायेगा ।


अपवाद - इसके कुछ अपवाद निम्नलिखित है ( 1 ) दल - विभाजन- यदि किसी विधानमण्डल दल या संसद के 1/3 या अधिक सदस्यों ने उस दल से अलग होकर किसी नये दल का निर्माण कर लिया हो ।


( ii ) दल - विलय- यदि दो या उससे अधिक विधानमण्डल दल अपनी कुल सदस्यता के 2/3 बहुमत से विलय का निर्णय ले ।


( iii ) अध्यक्ष पद के लिए जब संसद , विधान सभा या राज्य सभा का कोई सदस्य स्पीकर / डिप्टी स्पीकर / चेयरमैन / डिप्टी चैयरमैन के पद पर अपने चुनाव से तुरन्त पहले तलीय निष्पक्षता की दृष्टि से अपने दल से त्याग - पत्र देता है । उपरोक्त पद से हटने के बाद उसे किसी होगा । में पुनः सम्मिलित होने का अधिकार कोई विधायक उपर्युक्त नियम के अधीन विधानमण्डल की सदस्यता के लिए अनर्ह हुआ या नहीं , इसका निर्णय सदन का अध्यक्ष करेगा । इस मामले में अध्यक्ष का निर्णय अन्तिम होगा और न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होगा । इस अधिनियम को कार्यान्वित करने के लिए सम्बन्धित सदन के अध्यक्ष को सदन के अनुमोदन से नियम और उपनियम बनाने का अधिकार होगा । 12 नवम्बर , 1991 को नागालैण्ड , गुजरात , मेघालय , मणिपुर के अयोग्य करार दिये गये अनेक विधायकों की याचिकाओं के बारे में दल - बदल विरोधी कानून के सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय दिया । सर्वोच्च न्यायालय ने यद्यपि दल - बदल विरोधी कानून को वैध करार दिया परन्तु 10 वीं अनुसूची के अनुच्छेद 7 को असंवैधानिक घोषित कर दिया । इस भाग में सदस्यों की अनर्हता के सम्बन्ध में अध्यक्ष का निर्णय अन्तिम माना गया था । उच्चतम न्यायालय का मत था कि दल - बदल निरोधक कानून के अन्तर्गत सदस्यों की अनर्हता पर विचार करते समय अध्यक्ष की स्थिति केवल एक ट्रिब्यूनल जैसी होती है । अतः उसके द्वारा किये गये निर्णयों का उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय पुनरावलोकन कर सकते हैं ।





दल - बदल निरोधक अधिनियम की कमियाँ इस अधिनियम में कमियाँ निम्न प्रकार देखी जा सकती हैं

( i ) इस कानून से 1/3 सदस्यों के दल - बदल को रोका जा सकता है परन्तु 1/3 से अधिक सदस्यों के दल - बदल को नहीं । उदाहरण के लिए , 1980 में हरियाणा में भजन लाल ने अपने 37 विधायकों के साथ जनता पार्टी से दल - बदल करके कांग्रेस में सम्मिलित होने को सही माना गया ।


( ii ) निर्दलीय सदस्यों के आचरण पर इससे प्रभावशाली नियन्त्रण नहीं लगता क्योंकि निर्दलीय सदस्य किसी दल की सदस्यता ग्रहण किये बिना ही सरकार को बनाने और गिराने में बाहर से रहकर ही खेल खेलते हैं ।


( iii ) यह अधिनियम उन विधायकों पर भी लागू नहीं होता जो सदन में तो दल के हिप का समर्थन करते हैं । परन्तु सदन से बाहर दल - विरोधी गतिविधियों में सम्मिलित होते हैं । उदाहरण के लिए , 1987 में वी . पी . सिंह के जनमोर्चा के सदस्यों ने सदन से बाहर वी . पी . सिंह की खुलकर आलोचना की ।


( iv ) पार्टी द्विप के उल्लंघन करने पर सदस्यता की समाप्ति की व्यवस्था भाषण की स्वतन्त्रता के संसदीय विशेषाधिकार पर कुठाराघात है ।


( v ) सदन के अध्यक्ष का व्यवहार इंग्लैण्ड की कामन सभा के स्पीकर जैसा निष्पक्ष नहीं होता , वह अपने दल का सदस्य स्पीकर बनने के बाद भी बना रहता है । इसलिए अपने दल को अपने निर्णय से राजनीतिक लाभ दे सकता है ।


( vi ) इस अधिनियम में यह स्पष्ट नहीं है कि यदि सांसद या विधायक को उसका दल बहिष्कृत कर देता है तो क्या होगा ।


( vii ) इस अधिनियम से दल - बदल पर प्रभावी रोक नहीं लगी है । सितम्बर 2003 में उत्तर प्रदेश में बसपा के 37 विधायकों ने दल - बदल कर नया दल गठित किया और मुलायम सिंह को समर्थन दे दिया ।



सुझाव ( Suggestions )

दल - बदल रोकने के लिए कुछ सुझाव निम्न प्रकार दिये जा सकते हैं


( i ) राजनीतिक दलों की संख्या कम की जाये T

( ii ) दल - बदलुओं के चुनाव लड़ने पर अगले 5 वर्ष तक प्रतिबन्ध लगे ।

( iii ) जनता दल - बदलुओं का बहिष्कार करें ।

( iv ) कोई भी राजनीतिक दल किसी भी दल - बदलू को अपने दल में स्थान न दे ।

( v )विधायक और सांसद अपने क्षेत्र के मतदाताओं की भावना काआदर करते हुए उनके साथविश्वासघात करें ।

( vi ) दल - बदल करने वाले विधायक / सांसद की सदस्यता समाप्त करने सम्बन्धी कानून पारित किया जाये ।

( vii ) जो दल अन्य दलों के विधायकों / सांसदों को तोड़ने के लिए धन या पद का लोभ दें , उनको काली सूची में स्थान दिया जाये ।

( viii ) दल - बदल विरोधी कठोर कानून बनाया जाये ।

( ix ) सांसद और विधायक राजनीतिक नैतिकता का आचरण करें ।

( x ) दल - बदल को राजनीतिक अपराध घोषित किया जाये ।

( xi ) मन्त्रिपरिषद् की सदस्य संख्या विधान सभा / लोक सभा के सदस्यों के 1/10 से अधिक न हो ।



दल - बदल विरोधी कानूनों को कड़ा करने के लिए संविधान के 97 वें संशोधन विधेयक को लोकसभा ने 16 दिसम्बर और राज्य सभा ने 18 दिसम्बर , 2003 को अपनी स्वीकृति दे दी । इस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद यह संशोधन प्रभावी हो गया । इसके अनुसार , दल - बदल करने वाले निर्वाचित जनप्रतिनिधि की सदस्यता समाप्त करने का प्रावधान किया गया है ।


इसके साथ जम्बो मन्त्रिमण्डल पर रोक लगाने की भी व्यवस्था है । अब छोटे राज्यों में अधिकतम 12 सदस्यों तथा बड़े राज्यों में 15 % सदस्यों को ही मंत्री बनाने की सीमा निश्चित की गई है । वर्तमान कानून में दल - बदल के लिए कम - से - कम एक - तिहाई सदस्यों का होना आवश्यक है ।


नये कानून में व्यवस्था की गई है कि यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि अपने दल को छोड़कर किसी दूसरे दल में सम्मिलित होता है तो उसकी सदस्यता तत्काल समाप्त हो जायेगी और वह कोई लाभ का पद प्राप्त नहीं कर सकेगा ।


उसे नये दल के चुनाव चिह्न पर पुनः निर्वाचित होना पड़ेगा । यदि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को कोई राजनीतिक दल निलम्बित या निष्कासित कर देता है तो उस स्थिति में यह नियम लागू नहीं होगा ।


महाराष्ट्र की राजनीति में हाल ही में हुए हंगामे ने एक बार फिर संविधान की 10वीं अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून के मुद्दे को ज्वलंत कर दिया है। जन प्रतिनिधियों द्वारा पक्ष/पार्टी बदलने की आदत राजनीतिक और सामाजिक रूप से काफी खराब है और लोकतंत्र में अस्वीकार्य है जहां एक प्रतिनिधि को जनादेश और जिस राजनीतिक दल का वह प्रतिनिधित्व कर रहा है उसमें विश्वास और निश्चित रूप से उसकी छवि पर चुना जाता है।


रिज़ॉर्ट गवर्नमेंट का यह निरंतर चलन जहां विधानसभा के सदस्यों को बंदियों की तरह ले जाकर कहीं दुर्गम स्थान पर किसी आलीशान होटल या रिज़ॉर्ट में रखा जाता है, जहां कोई भी, उनके परिवार के सदस्यों सहित, उन तक नहीं पहुंच सकता है। हमारे देश में पिछले कुछ वर्षों से यह लगातार हो रहा है जो आम आदमी और वोटरों के जनादेश का दुरुपयोग है। यह एक ऐसी छवि को चित्रित करता है जहां यह दर्शाता है कि निर्वाचित सदस्यों की पार्टी और मतदाताओं के प्रति कोई निष्ठा नहीं है।


सुप्रीम कोर्ट ने "किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिलु व अन्य 1992" के मामले में स्पष्ट कहा है कि अध्यक्ष या स्पीकर द्वारा निर्णय प्रस्तुत करने से पहले के एक चरण में न्यायिक समीक्षा उपलब्ध नहीं हो सकती है। संवैधानिक कोर्ट दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की कार्यवाही की न्यायिक रूप से समीक्षा नहीं कर सकता है, अर्थात संविधान के दलबदल विरोधी कानून, जब तक कि सदन के अध्यक्ष या स्पीकर योग्यता के आधार पर अंतिम निर्णय या प्रस्तुत नहीं करते हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने उद्धव ठाकरे-एकनाथ शिंदे विवाद को बड़ी बेंच के पास भेजने के संकेत दिए ,सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की तीन-जजों की पीठ ने बुधवार को कहा कि उद्धव ठाकरे-एकनाथ शिंदे विवाद को बड़ी बेंच के पास भेजा जा सकता है। भारत के चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस हेमा कोहली की पीठ अयोग्यता कार्यवाही, स्पीकर के चुनाव, पार्टी व्हिप की मान्यता और महाराष्ट्र विधानसभा में शिंदे सरकार के लिए फ्लोर टेस्ट के संबंध में शिवसेना पार्टी के एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे गुटों से संबंधित याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर छह याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।


CJI एनवी रमना ने सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से टिप्पणी की कि महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे जिन मामलों में उत्पन्न होते हैं उसके लिए एक बड़ी पीठ द्वारा निर्णय की आवश्यकता हो सकती है। CJI ने कहा, "कुछ मुद्दे महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे हैं जिन्हें सुलझाया जाना चाहिए।" CJI ने कहा, "कुछ मुद्दे, पैरा 3 (दसवीं अनुसूची के) को हटाने के परिणाम और विभाजित अवधारणा की अनुपस्थिति, क्या अल्पसंख्यक पार्टी के नेता को पार्टी के नेता को अयोग्य घोषित करने का अधिकार है, ये कुछ मुद्दे हैं। यदि आप मुद्दों को सुलझा सकते हैं, हम तय कर सकते हैं कि कैसे आगे बढ़ना है।" हालांकि, CJI ने स्पष्ट किया कि वह तुरंत पीठ का गठन नहीं कर रहे हैं और पार्टियों को पहले प्रारंभिक मुद्दों के साथ आना चाहिए।


CJI ने स्पष्ट किया, "मैंने बड़ी बेंच को संदर्भित करने का आदेश पारित नहीं किया है, मैं इस पर सोच रहा हूं।" मामले को अब 1 अगस्त को प्रारंभिक मुद्दों पर चर्चा के लिए सूचीबद्ध किया गया है। 11 जुलाई को कोर्ट द्वारा पारित यथास्थिति आदेश, अयोग्यता कार्यवाही को स्थगित रखना, जारी है। आदेश में कहा गया है, "वकीलों को सुनने के बाद यह सहमति हुई है कि यदि आवश्यक हो तो कुछ मुद्दों को एक बड़ी पीठ को भी भेजा जा सकता है। इसे ध्यान में रखते हुए, पार्टियों को मुद्दों को तैयार करने में सक्षम बनाने के लिए, उन्हें अगले बुधवार तक इसे दर्ज करने दें।" आज कोर्ट में क्या हुआ? आज की शुरुआत में, CJI रमना ने कहा कि उन्हें दसवीं अनुसूची से पैरा 3 को हटाने के परिणामों के बारे में कुछ संदेह है, जिसने आंतरिक-पार्टी विभाजन की अनुमति दी। 2003 में 91वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 3 को हटा दिया गया था। CJI ने स्पष्ट किया कि वह कोई विचार व्यक्त नहीं कर रहे हैं और केवल अपनी शंकाओं को दूर करना चाहते हैं।


उन्होंने कहा कि पैरा 3 को हटाने के बाद, विभाजन की अवधारणा को मान्यता नहीं है। उन्होंने पूछा कि जब कोई विभाजन नहीं हुआ है, तो परिणाम क्या होंगे! उद्धव गुट द्वारा दायर याचिकाओं में उपस्थित सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और एडवोकेट डॉ एएम सिंघवी ने तर्क दिया कि चूंकि विरोधी समूह ने चीफ व्हिप का उल्लंघन किया है, इसलिए वे दसवीं अनुसूची के अनुसार अयोग्य हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अनुसूची के पैरा 4 के तहत सुरक्षा उन्हें उपलब्ध नहीं है क्योंकि उनका किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय नहीं हुआ है।


वर्तमान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की ओर से सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे ने तर्क दिया कि दसवीं अनुसूची आंतरिक-पार्टी लोकतंत्र का गला घोंटती नहीं है। लक्ष्मण रेखा को पार किए बिना पार्टी के भीतर आवाज उठाना दलबदल का नहीं है। साल्वे ने प्रस्तुत किया कि पैरा 3 को देखने की कोई आवश्यकता नहीं है और यह मुद्दा केवल पैरा 2 तक ही सीमित है, जो उनके अनुसार वर्तमान तथ्यों और परिस्थितियों में किसी भी अयोग्यता को आकर्षित करने के लिए लागू नहीं है। आगे कहा, "आपको स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़नी होगी या पैरा 2 के तहत इसके खिलाफ मतदान करके पार्टी व्हिप का उल्लंघन करना होगा। "स्वेच्छा से पार्टी सदस्यता छोड़ना" की व्याख्या की गई है।


यदि कोई सदस्य राज्यपाल के पास जाता है और कहता है कि विपक्ष को सरकार बनाना है, तो यह स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ने के लिए आयोजित किया गया है। यदि मुख्यमंत्री के इस्तीफा देने के बाद, और दूसरी सरकार शपथ लेती है, तो यह दलबदल नहीं है। क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि एक आदमी जिसे 20 विधायकों का समर्थन नहीं मिल सकता है उसे मुख्यमंत्री के रूप में बहाल किया जाना चाहिए?


मुझे लोकतंत्र के अंदरूनी हिस्से के रूप में नेता के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार है। आवाज उठाना अयोग्यता नहीं है। पैरा 3 एक गैर-मुद्दा है।" सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित याचिकाएं:


1. उपसभापति द्वारा जारी अयोग्यता नोटिस को चुनौती देने वाली शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे द्वारा दायर याचिका और भरत गोगावले और शिवसेना के 14 अन्य विधायकों द्वारा दायर याचिका में डिप्टी स्पीकर को अयोग्यता याचिका में कोई कार्रवाई करने से रोकने की मांग की गई है, डिप्टी स्पीकर तय करेगा।


2. शिवसेना के चीफ व्हिप सुनील प्रभु द्वारा दायर याचिका में महाराष्ट्र के राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री को महा विकास अघाड़ी सरकार का बहुमत साबित करने के निर्देश को चुनौती दी गई है।


3. उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले खेमे द्वारा नियुक्त किए गए व्हिप सुनील प्रभु द्वारा दायर याचिका, एकनाथ शिंदे समूह द्वारा शिवसेना के चीफ व्हिप के रूप में नामित व्हिप को मान्यता देने वाले नव निर्वाचित महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष की कार्रवाई को चुनौती देती है।


4. एकनाथ शिंदे को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में आमंत्रित करने के महाराष्ट्र के राज्यपाल के फैसले की आलोचना करते हुए शिवसेना के महासचिव सुभाष देसाई द्वारा दायर याचिका और 03.07.2022 और 04.07.2022 को हुई राज्य की विधान सभा की आगे की कार्यवाही को अवैध बताते हुए चुनौती दी गई है।








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