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आचरण का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

अपडेट करने की तारीख: 31 जुल॰ 2021


आचरण का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण



पश्यचायत नीतिशास्त्र के गृहीत आधार

भारतीय नीतिशास्त्र के समान पश्चयात नीतिशास्त्र के भी गृहीत आधार है । लकीन भारतीय तत्वज्ञों ने जिस प्रकार से गृहीत आधार का वर्गिकरण करते हुए उनका स्पष्टीकारण किया है । उस प्रकार का विस्तृत विवेचन पश्यचायत नीतिशास्त्र मे नहीं है । पश्चायत नीतिशास्त्र के अनुसार गृहीत आधार इस प्रकार है ।

1. व्यक्तित्वव्यक्तित्व नीतिशास्त्र का प्रमुख आधार है । नैतिक नियम बनाने के लिए व्यक्ति का विवेकशील हीना अवश्यक है नैतिकता का ज्ञान होना याने की शुभ –अशुभ का कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान होना आवश्यक है इस लिए नीतिशास्त्र ये मानकर ही आगे बढ़ता है । की व्यक्ति के पास नैतिकता का पूरा ज्ञान है ।


2. विवेक-विवेक का अर्थ है बुद्धि ।विवेक नैतिकता का दूसरा गृहीत आधार है । मनुष्य मे बुद्धि तथा विवेक होने के कारण ही वह पशु से या जानवर से भिन्न है । मानुष्य बुद्धिमान प्राणी है या विवेकशील प्राणी है । इस विशवास से ही नैतिकता तथा अनैतिकता मनुष्य से ही संबन्धित मनी जाती है । अथवा मनी गई है ।

3. संकल्प स्वतंत्रय- संकल्प स्वतंत्र्य प्रत्येक मनुष्य को । यह नीतिशास्त्र द्वारा स्वीकार किया गया है । प्रत्येक व्यक्ति को विचार करने की स्वतंत्रता है उसी प्रकार व्यक्ति को स्वतंत्र्य है । इसी ग्रहीत आधार के कारण ही प्रत्येक व्यक्ति को उसकी कृति का जिम्मेदार ठहराया जाता है ।

4. काण्ट ‘’नामक बुद्धिवादी तत्वज्ञानी के अनुसार मनुष्य को संकल्प स्वतंत्र्य है वह विवेकशील प्राणी है । इसके अलावा उन्होने निम्न – गुहित आधार स्वीकार किए है ।

5. काण्ट के अनुसार संकल्प स्वतंत्र्य नैतिकता तथा जीवन के लिए आवश्यक है । यदि मनुष्य अपने कर्मो को करने मे स्वतंत्र्य नहीं है तो वह अपने कर्मो के लिए उतरदायी भी नहीं है । इसलिए नैतिकता के लिए संकल्प स्वतंत्र्य होना आवश्यक है ।

6. अत्मा की अमरता --- काण्ट के अनुसार इच्छा और कर्तव्य के सतत संघर्ष को जितना ही नैतिकता है । परंतु यह कार्य इतना कठिन है की एक सीमित जीवन मे उसको पूर्ण करना असंभव है । नैतिकता का ध्येय प्राप्त करने के लिए यह मानना की आत्मा अमर है अत्यंत आवश्यक है इसलिए आत्मा की अमरता को गुहित आधार के रूप मे स्वीकार किया गया है ।



नियतिवाद ,अनियतिवाद ,आत्मनियतिवाद

संकल्प स्वतंत्र्य का प्रश्न तत्व ज्ञान मे अतिशय महत्वपूर्ण होता है । अगर हम मन लेते है की व्यक्ति संकल्प करने मे स्वतंत्र है या निर्णय लेने मे स्वतंत्र होता है । तभी हम उस कृति के लिए उसे जिम्मेदार ठहरा सकते है ,लकीन प्रश्न यही है ?इस विषय मे तत्वज्ञान के अन्तर्गत तीन प्रमुखवाद चर्चा मे है –


1. नियतिवाद ,---नियतिवाद के अनुसार मनुष्य को कृति करने के लिए स्वतंत्र नहीं है । प्रत्येक कृति सुष्टि मे जो घटनाए एव दूसरे से जुड़ी हुई होती है उसका ही परिणाम है । प्रत्येक कृति व्यक्ति के चरित्र से आनुवंशिकता से तथा उसके परिस्थिति से जुड़ी हुई होती है और इन सभी घटको का कृति पर परिणाम होती है इसलिए मनुष्य संकल्प स्व्तंत्र्य मे स्वतंत्र नहीं है ।


2. अनियतिवाद , इसके अनुसार हम कृति करने के लिए स्वतंत्र है । नीतिशास्त्र ,राज्यशास्त्र का कायदा अनियतिवाद पर ही आधारित है । नीतिशास्त्र के अनुसार हमे अपने कर्तव्य निभाने चाहिए । इसका अर्थ है की हमने यह मानलिया है की वह कर्तव्य करने की क्षमता हममे है । इसीलिए हम उस कृति के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है ।

3. आत्मनियतिवादनियतिवाद तथा अनियतिवाद दोनों पर विचार विमर्श करने के बाद इस निर्णय पे हम आते है की कुछा सच्चाई नियतिवाद मे है उसी प्रकार अनियातीवाद मे भी है । इसलिए इन दोनों का समानव्य करके आत्मनियतिवाद का स्पष्टी कारण दिया गया है । इनके अनुसार नियतिवाद के बारे मे सोचने से हमे ये समझ मे आता है की एक बार चरित्र प्रस्थपित होने पर हम उसी प्रकार की कृति करते है । लकीन चरित्र प्रस्थपित होने के पहले हम पूरी तरह से स्वतंत्र है । एक बार शराबी बन गए तो शराब जीवन का हिस्सा बन जाती है ।

कर्मो के प्रकार –पश्चात्य नीतिशास्त्र के अनुसार कर्म के तीन प्रकार है ।

a) स्वय निर्मित कर्म

b) अनिच्छा कर्म

c) असवायानिर्मित कर्म


1. स्वयनिर्मित कर्मजो कृति किसी संकल्प के अनुसार की जाती है उसे स्वयानिर्मित कर्म कहते है । इसका अर्थ यह है की मनुष्य के सामने जब अनेक विकल्प होते है उसमे से किसी एक को चुनने के बाद उसी के अनुसार कृति की जाती है ,उसे स्वयानिर्मित कर्म कहते है । इसीलिए इस प्रकार की कृति के लिए वह पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराया जाता है इस प्रकार की कृति मनुष्य द्वारा पूरे होशोहवास मे की जाती है ।


2. अनिच्छा कर्म ---जब व्यक्ति की प्रकार का कर्म करने का निर्णय लेता है । लकीन कुछा अनपेक्षित परिस्थितियो के कारण उस कर्म को न करते हुए विपरीत कृति उसके हाथो से होती है इस प्रकार के कर्म को अनिच्छा कर्म कहाते है । याने जो कृति या कर्म स्वयानिर्मित कर्म से विपरीत होती है तब उसे अनिच्छा कर्म कहते है । जैसे की क्रीकेट मे मैच के आखरी गेंद पर बिना रन लिए आउट होना ।

3. असवायानिर्मित कर्मइसे अनैच्छीक कर्म भी कहते है । जिन कृतियों मे मनुष्य की इच्छाओ को स्थान नहीं होता उस प्रकार की कृतियो को अनैच्छिक या अस्वयानिर्मित कर्म कहते है ।इसमे कई प्रकर की शरारिक क्रियाये ,सहजात क्रियाये इंका अंतरभवा इसमे होता है । यह कृतियाँ नैसर्गिक होती है लकीन इसमे करने वाले का कोई हेतु नहीं होता है ।


इस प्रकार से नैतिक क्रियाओ का विशलेशन करने के पशचायत एक बात स्पष्ट होती है की केवल स्वयानिर्मित कर्मो के लिए ही मनुष्य को उस कृति के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। इस स्वयानिर्मित कर्म की प्रक्रिया इस प्रकार है। सर्वप्रथम मनुष्य को अपने जीवन मे कुछा वस्तुओ का आभाव दिखाई देता है या होता है । उस आभाव के कारण मन मे दुखद भावना उत्पन्न होती है । इस भावना को निकालने की इच्छा मन मे निर्माण होती है सुख और दुख के बीच मे अनेवाली यह इच्छा संघर्षात्मक विचार विनियम करके किसी एक विकल्प का आवंत करता है और उस विकल्प के अनुसार कृति करने का संकल्प करता है ।


इस प्रकार इस संकल्प को नैतिक महत्व नहीं है लकीन इस संकल्प के अनुसार की गई कृति महत्वपूर्ण होती है इसीलिए सही मायने मे नैतिक निर्णय का विषय संकल्प सहकृति है इस प्रकार यही कृति को स्वयानिर्मित कर्म मे अंत भूत करते हुए व्यक्ति को उस कृति का जिम्मेदार ठहराया जाना है ।


हेतु तथा उद्देश्य मे अंतर स्पष्ट कीजिये ?

परीनंवाद तथा हेतुवाद

नैतिक निर्णय का विषय क्या हो सकता है ?इसका उतर स्वया निर्मित कर्म मे यह दिया जाता है की फिर भी संकल्प सहकृति इसमे हेतु महत्वपूर्ण है या परिणाम महत्वपूर्ण है ? इसका भी निर्णय लिया जाता है भिन्न –भिन्न तत्वज्ञों ने इस विषय पर चर्चा की है । कुछा तत्वज्ञों के अनुसार कृति का परिणाम महत्वपूर्ण है । अगर उचित है या योग्य है तो ही वह कृति योग्य कहलाती है इस विचार धारा को ही परीनंवाद कहते है ।


इससे विपरीत कुछ तत्वज्ञों के अनुसार कृति की योगिता ,कृति के परिणाम पर आधारित न होते हुए उन कृतियो के पीछे मनुष्यो का जो हेतु होता है वह महत्वपूर्ण है । अगर हेतु सही है तो परिणाम चाहे बुरे ही क्यो न हो वह कृति अच्छी ही कहलाती है । इस विचार धारा हो हेतु वादी परम्परा कहते है ।


परिणाम तथा हेतु वाद परस्पर विरोधी नहीं है । यहाँ हेतु तथा उद्देश्य किसे कहते है ?यह स्पष्ट होना जरूरी है । इसका स्पष्टी कारण इसप्रकार से है नैतिक निर्णय के संदर्भ मे साध्य और साधन का विचार महत्वपूर्ण है । साध्य हमेशा साधनो का समर्थन करता है लेकिन कभी कभी साधनो द्वाराभी सध्या का समर्थन किया जाता है अगर सध्य अच्छा है तो उससे जुड़े साधन भी अच्छा होना जरूरी है क्या ?यह महातपूर्ण प्रश्न है जिसका उत्तर हेतु और उद्देश्य की संकल्पन मे ही मिलता है ।


हेतु तथा उद्देश्य / अभिप्राय

बेन्थ्म और मिल इन तत्वज्ञों के अनुसार हेतु से परिणाम ज्यादा महत्वपूर्ण हिते है । हेतु याने कर्म करने की इच्छा है तथा उद्देश्य याने विशिष्ट ध्येय का विचार है ।

हेतु भावना का कारक कारण है तथा उद्देश्य अंतिम कारण है

हेतु की तुलना मे उद्देश्य ज्यादा व्यापक है ।

स्व्यनिर्मित कर्म मे भी उद्देश्य को हेतु से ज्यादा महत्व दिया गया है ।

हेतु से उद्देश्य ज्यादा व्यापक है क्यो की उद्देश्य मे इष्ट तथा अनिष्ट दोनों परिणामो का विचार अंतभूत है । इसका स्पष्टी कारण इस प्रकार से भी दिया जाता है ।


इस प्रकार से उद्देश्य हेतु से हमेशा ही व्यापक होता है ।


उद्देश्य (अभिप्राय )के प्रकार


तात्कालिक तथा प्रच्छन्न अभिप्राय ।

बाहरी तथा आंतरिक अभिप्राय ।

प्रत्येक्ष तथा अप्रत्येक्ष अभिप्राय

चेतन तथा अचेतन अभिप्राय

औपचारिक तथा यथार्थ अभिप्राय


तात्कालिक तथा प्रछ्न्न अभिप्रायतात्कालिक जैसे डूबते हुए व्यक्ति को बचाने तथा प्रछन्न याने हर एक व्यक्ति की अपनी अपनी सोच होना ।

बाहरी तथा आंतरिक अभिप्रायकुछ कर्म बाह्य स्वरूप मे अधिक महत्वपूर्ण होते है इसके विपरीत कुछ कर्म आंतरिक रूप से महत्वपूर्ण होते है ।

प्रत्येक्ष तथा अप्रत्येक्ष अभिप्राय ---किसी व्यक्ति पर जान लेवा हमला करना यह प्र्त्येक्ष उद्देश्य है । तथा किसी ट्रेन मे बैठे एक व्यक्ति की जान लेने के लिए ट्रेन को उड़ा देना अप्रत्येक अभिप्राय है ।

चेतन तथा अचेतन अभिप्राययह उद्देश्य सजीव तथा निर्जीव से जुड़ा हुआ है ।

औपचारिक तथा यथार्थ अभिप्राय --- औपचारिक निर्णय प्रत्येक्ष निर्णय के समान होते है तथा यथार्थ निर्णय अप्रत्येक्ष निर्णय के समान होते है इस प्रकार उपयूक्त विवेचन द्वार यह स्पष्ट होता है की उद्देश्य याने असफल परिणाम तथा परिणाम याने सफल उद्देश्य है ।


कर्तव्य और अधिकार----अधिकार और कर्तव्य सापेक्ष शब्द है जो एक दुष्टि से अधिकार है वही दूसरे संबंध मे कर्तव्य हो जाता है । जहां अधिकार है वहाँ कर्तव्य है ।


नैतिक अधिकार


जीने का अधिकार - जीने का अधिकार मनुष्य का सर्वप्रथम और मुख्य अधिकार है । इस अधिकार मे काम करने का अधिकार भी सम्मिलीत है इसीलिए किसी की हत्या करना गुनाह होता है ।

स्वतंत्रता का अधिकारस्वतंत्रता का अधिकार के बिना नैतिक कार्यो की कल्पना असम्मभाव है प्रत्येक्ष व्यक्ति अपना ध्येय साध्य करने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए । इसीकारण गुलामीगिरी गुनाह है ।

संपत्ति का अधिकार स्वतंत्रता के अधिकार के साथ संपत्ति का भी अधिकार भी लगा हुआ हैजैसे रहने के लिए संपात्ति का अधिकार आवश्यक है अर्थात इस आधीकर का दुरुपयोग ठीक नहीं है ।

समझोते की पूर्ति का अधिकार –समझोते की पूर्ति का अधिकार तभी अर्थपूर्ण हो सकता है जैसे समझोते की पूर्ति के साधनो पर व्यक्ति का अधिकार हो अर्थात सम्पत्ति के अधिकार की सीमाये समझोते के अधिकार पर ही लागू होते है ।

शिक्षा का अधिकारशिक्षा से ही व्यक्ति बनता है । नैतिक दुष्टिकोण से प्रत्येक व्यक्ति अपनी योगयता के अनुसार सर्वोत्तम शिक्षा पाने के लिए बाध्य है ।


नैतिक कर्तव्य

जीवन का सम्मान – अपने और दूसरों के जीवन का सम्मान करना मनुष्य का प्रथम कर्तव्य है । आत्महत्या तथा हत्या दोनों ही घोर अनैतिक कार्य है ।

स्वतन्त्रता का सम्मान –स्वतंत्रता के अधिकार के साथ स्वतंत्रता के सम्मान का कर्तव्य भी लगा हुआ है । इसीकारण दूसरों को गुलाम बनाना उनका शोषण करना घोर अन्याय है ।

चरित्र का सम्मान –चरित्र ही मनुष्य मे सर्वोच्चय गुण है इसीलिए हमे संव्यां और दूसरों के चरित्र का सम्मान चाहिए ।

सम्पत्ति के अधिकार के साथ सम्पत्ति के सम्मान का कर्तव्य भी लगा हुआ है । निजी संपत्ति का सदुपयोग करते समय दूसरों के संपत्ति मे बाधक नहीं बनना चाहिए इसी कारण चोरी करना नैतिक अपराध है

सामाजिक व्यवस्था का सम्मान –व्यक्ति और समाज का कल्याण इस पर निर्भर है व्यक्ति के अधिकार की रक्षा तभी हो सकती है जब तक की सामाजिक व्यवस्था बनी रहे इसीलिए सामाजिक व्यवस्था का सम्मान करना चाहिए ।

सत्य का सम्मान –मनुष्य को अपने वचनो का पालन करना चाहिए । विचार तथा कर्म मे समजस्य रखना चाहिए । यह कर्तव्य समझोते के अधिकार से जुड़ा हुआ है ।

प्रकृति का सम्मान –प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति मे आस्था रखनी चाहिए । परिश्रम ही पुजा है समाज की प्रकृति व्यक्ति से जुड़ी हुई है ।


अधिकार और कर्तव्य मे परस्पर संबंध है

अधिकार और कर्तव्य अन्योन्याश्रीत है ।

अधिकार और कर्तव्य परस्पर सापेक्ष है ।

अधिकार और कर्तव्य एक ही नैतिक नियमो के दो पहलू है ।











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